Dhundhiraja Chaturthi Vrat Katha in Hindi

Dhundhiraja Chaturthi Vrat Katha in Hindi

राजा हेमांगद के पेट दर्द और उसके इलाज की कहानी


महाराजा दशरथ ने अपने गुरु वशिष्ठ से कहा - "हे मुनिवर! मैं अभी भी कथामृत का पान कर तृप्त नहीं हुआ हूँ। अतः कृपया अब आप फाल्गुन शुक्लपक्ष चतुर्थी का माहात्म्य वर्णित करने की कृपा करें।"

वशिष्ठ मुनि बोले - "हे नृपोत्तम! फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी वर प्रदान करने वाली होती है। मैं इस व्रत से सम्बन्धित माहात्म्य का वर्णन कर रहा हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो -

मालव प्रदेश में समस्त प्रकार के वैभव एवं शोभाओं से युक्त भारक नाम का एक भव्य नगर था। वह नगर धर्माचरण करने वाले सज्जनों से युक्त था। उस नगर में एक धर्मपरायण राजा नीतिपूर्वक शासन करते थे जिनका नाम हेमांगद था। राजा हेमांगद शस्त्र विद्या एवं युद्ध-कला में तो निपुण थे ही, अपितु अत्यन्त ज्ञानी एवं विद्वान भी थे। उन्होंने समस्त भूमण्डल पर विजय प्राप्त कर ली थी। इसीलिये राजा हेमांगद सभी राजाओं द्वारा मान्य एवं सर्वसम्मत थे, अर्थात् भूलोक के समस्त राजा उनका आदर करते थे। वे ब्राह्मणों, देवताओं एवं अतिथियों के भी प्रिय थे।

कालान्तर में एक दिन अकस्मात् ही राजा हेमांगद उदर शूल नामक रोग से ग्रसित हो गये। अर्थात् उनके उदर में अत्यन्त भयङ्कर पीड़ा होने लगी। राजा को उदर में शस्त्र के आघात के समान हृदय विदारक पीड़ा हो रही थी। उस असहनीय पीड़ा से व्याकुल होकर राजा रुदन करने लगे। राजा के उदर शूल के उपचार हेतु नाना प्रकार के मन्त्रों एवं औषधियों का प्रयोग किया गया, किन्तु राजा की पीड़ा में और अधिक वृद्धि होती चली गयी। तदुपरान्त राजा ने वेदज्ञों द्वारा निर्देशित तीर्थों में जाकर देवताओं आदि की पूजा-अर्चना की किन्तु उसके शूल में उत्तरोत्तर वृद्धि होती चली गयी। राजा को इतनी अधिक वेदना होने लगी कि व्यथित होकर उसने देहत्याग करने का निश्चय कर लिया।

उसी समय संयोगवश महायोगी पर्वत मुनि राजा के महल में पधारे। उदर वेदना से पीड़ित राजा ने मुनिवर को सादर प्रणाम करते हुये अपनी उदर पीड़ा का शमन करने का अनुरोध किया। राजा हेमांगद ने पर्वत मुनि से कहा - 'हे मुनिश्रेष्ठ! आपके पावन चरण-कमलों के दर्शन प्राप्त कर मेरा जन्म सफल हो गया तथा मेरे माता-पिता, पुत्र आदि सभी धन्य हो गये।' ऐसा कहते हुये राजा पीड़ा के कारण भूमि पर गिर पड़ा तथा रुदन करने लगा। राजा की यह दशा देख वहाँ उपस्थित ब्राह्मण आश्चर्यचकित हो गये। ब्राह्मणों को चकित होने पर पर्वत मुनि ने राजा के सचिवों से पूछा - 'हे सचिवों! किस प्रकार राजा हेमांगद को यह दारुण दुःख प्राप्त हुआ है। राजा की इस दुर्दशा का कारण मुझे बतायें।'

सचिवों ने कहा - 'हे मुनिवर! हमारे महाराज को उदर में अत्यन्त उग्र शूल हुआ था। उस शूल की पीड़ा के निवारण हेतु नान प्रकार की औषधियों, मन्त्रों एवं उपायों का प्रयोग किया गया, यहाँ तक की अनेकों तीर्थों में जाकर विभिन्न देवताओं का पूजन किया, किन्तु राजा को शूल से मुक्ति प्राप्त नहीं हुयी। अपितु उनकी पीड़ा में उत्तरोत्तर वृद्धि होती चली गयी।'

यह सुनकर पर्वत मुनि ने ध्यान लगाया तथा राजा के पाप को ज्ञात कर कहा - 'हे राजन्! तुम्हारे राज्य में अत्यन्त घोर महापाप हुआ है, जिसके कारण तुम शूल से ग्रसित हो गये हो। हे राजन्! तुम्हारे राज्य से गणेश चतुर्थी का व्रत पूर्णतः समाप्त हो गया है। इस सामूहिक दोष के कारण ही तुम सज्जन को यह कष्ट प्राप्त हुआ है।'

राजा ने करबद्ध निवेदन करते हुये कहा - 'हे महात्मन्! यह व्रत कैसा है, इस व्रत में किसका पूजन किया जाता है तथा पूर्वकाल में किसने इस व्रत को आरम्भ किया था? कृपापूर्वक मेरी जिज्ञासा का समाधान करें।'

पर्वत मुनि ने कहा - 'हे राजन्! इस गणेश्वर व्रत के फलस्वरूप सभी कार्यों में सफलता तथा चारों पुरुषार्थ, अर्थात् धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत समस्त संसार में मान्य है।' ऐसा कहकर मुनि ने विस्तारपूर्वक चतुर्थी के माहात्म्य का वर्णन किया। माहात्म्य श्रवण कर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुये तथा पर्वत मुनि से पुनः बोले - 'हे महामुनि! यह भगवान गणेश कैसे हैं तथा उनका स्वरूप कैसा है? कृपया उनके स्वरूप का वर्णन करें, मैं उनके स्वरूप का ध्यान कर भजन करूँगा।'

पर्वत मुनि बोले - 'हे राजन्! मैंने पूर्वकाल में घटित भगवान गणेश से सम्बन्धित जिस चरित्र का श्रवण किया है, उसका वर्णन मैं अब तुम्हारे समक्ष करूँगा, ध्यानपूर्वक श्रवण करो। हे नृप! एक समय मैं यत्नपूर्वक धर्मपरायण होकर तपस्या कर रहा था। मेरी तपस्या से सम्पूर्ण भूमण्डल तप्त हो गया। मेरी उस तपस्या के कारण देवराज इन्द्र अत्यन्त क्षुब्ध हो गये। देवराज इन्द्र ने मेरी तपस्या में विघ्न उत्पन्न करने हेतु अप्सरा सहित कामदेव को भेजा। परन्तु मेरे तपोबल के तेज से कामदेव भी दग्ध होने लगा। उस समय इन्द्र वहाँ से कामदेव को लेकर भाग गया। तदनन्तर में शम एवं दम पारायण होकर अन्तर्निष्ठ हो गया। कुछ समय पश्चात् मेरा भाग्य जागृत होने पर अवधूत मार्ग के परम ज्ञाता योगिराज निदाघ ऋषि वहाँ प्रकट हुये। मैंने श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रणाम एवं उनका पूजन किया तथा उनसे बोला - 'हे महायोगिन्! ब्रह्मभूय पद प्रदान करने वाले आपके श्री चरणों का दर्शन प्राप्त कर मेरी तपस्या एवं मैं धन्य हो गया। हे नाथ! कृपया मुझे शान्ति प्रदायक योग का ज्ञान प्रदान करें, जिसकी साधना से मैं योगियों का वन्दनीय हो जाऊँ।''"

अब वशिष्ठ मुनि राजा दशरथ से कहते हैं कि - "अरे राजन्! जब पर्वत मुनि ने उन महायोगी निदाघ से यह प्रश्न किया तब महातपस्वी निदाघ ने पर्वत मुनि से कहा - 'हे पर्वत! मैं एक पुरातन वृत्तान्त का वर्णन करता हूँ जिसके कारण में योगिराजों द्वारा भी वन्दनीय हो गया था, तुम श्रवण करो। पूर्वकाल में मैंने महायोग की साधना की थी। तदुपरान्त मैं समान भाव से सदानन्द प्रदान करने वाले स्वानन्द, अर्थात् आत्मा के आनन्द में स्थित हो गया। हे राजन्! उस समय मैंने साक्षात् आनन्द का दर्शन किया, जो सर्वत्र द्वन्द्वों से व्याप्त था तथा द्वन्द्व में वह योगी रूप था। उससे मुझे शान्ति की प्राप्ति हुयी। तत्पश्चात् मैं भगवान विष्णु के समक्ष गया। क्योंकि मुझे शान्ति तो प्राप्त हुयी किन्तु वह द्वन्द्व रूप था, अतः मैं दुविधा में पड़ गया। मैंने भगवान विष्णु से कहा - 'हे प्रभो! मुझे शान्तिप्रदायक योग का ज्ञान प्रदान करने की कृपा करें, जिससे मुझे शान्ति प्राप्त हो।'

महायोगी भगवान विष्णु बोले - 'हे तात! योगशान्ति प्रदान करने वाले गणेश को ज्ञात करो। उन्हें ज्ञात कर हम सभी योगी गणों को शान्ति प्राप्त हो जायेगी। उनके नाम में जो गण शब्द है, उसमें गकार मन एवं वाणी से युक्त है तथा णकार मन एवं वाणी से रहित है। वे मन एवं वाणी से ज्ञात किये जा भी सकते हैं तथा नहीं भी। यह गण शब्द से ज्ञात होता है तथा उनके ईश स्वामी गणेश हैं। ऐसे भगवान गणेश की तुम विधिवत् आराधना करो, उससे निःसन्देह तुम्हें शान्ति अवश्य प्राप्त होगी।'

ऐसा कहकर भगवान विष्णु मौन हो गये। मैं उन्हें प्रणाम करके वन में जाकर योगाभ्यास में लीन हो गया तथा एकाक्षर मन्त्र से भगवान गणेश की आराधना करने लगा। निरन्तर दश वर्षों तक साधना करने पर गणपति मुझसे प्रसन्न हो गये तथा अकस्मात् ही मेरे समक्ष प्रकट हो गये। मुझे ध्यान में लीन देखकर गणेश जी ने कहा - 'हे वत्स! मैं तुम्हारी साधना से अत्यन्त प्रसन्न हूँ, तुम इच्छित वरदान माँगो।'

मैंने भगवान गणेश को प्रणाम करके उनका पूजन किया तथा सामवेदोक्त स्तोत्र से उनकी स्तुति करने लगा। मेरी स्तुति से वे प्रसन्न हो गये तथा मुझे शान्ति प्रदान कर वहाँ से अन्तर्धान हो गये। उसी समय से मैं गाणपत्य हो गया एवं नित्य गणेश जी के ध्यान में लीन रहने लगा। अतः तुम भी उन परम शान्ति प्रदान करने वाले गजानन गणेश की आराधना करो।' ऐसा कहकर निदाघ मुनि ने पर्वत मुनि को महामनु मन्त्र प्रदान किया तथा विधिवत् एकाक्षर मन्त्र के जाप का विधान वर्णित कर वहाँ से अन्तर्धान हो गये।

पर्वत मुनि बोले - 'हे राजन! उस समय से मैं निरन्तर श्रद्धापूर्वक भगवान गणेश का भजन करता हूँ। अतः उनका जाप करने से मुझे शान्ति प्राप्त हो गयी तथा उन्होंने मुझे अपने योगमय स्वरूप का दर्शन दिया। मैंने उनकी स्तुति की एवं वे अपने स्वानन्द में चले गये।' ऐसा कहकर पर्वत मुनि ने भगवान गणेश का दशाक्षर मन्त्र, अर्थात् गं गणपतये नमो नमः। राजा हेमांगद को प्रदान किया एवं वहाँ से अन्तर्धान हो गये।"

वशिष्ठ मुनि कहते हैं - "हे महाराज दशरथ! मन्त्र प्राप्त करने के पश्चात् राजा हेमांगद ने सर्वप्रथम फाल्गुन शुक्लपक्ष चतुर्थी का उत्तम व्रत किया। राजा ने सर्वत्र यह घोषणा कर दी कि - 'मेरे राज्य में सभी मनुष्यों को प्रत्येक मास के शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष की चतुर्थी को व्रत अनिवार्य रूप से करना होगा।' तदुपरान्त व्रत के पुण्यफल से राजा की उदर पीड़ा शान्त हो गयी तथा अन्य सभी मनुष्य भी रोगमुक्त हो गये। भूमण्डल पर सभी मनुष्य धन-धान्य एवं पुत्र-पौत्रादि से सम्पन्न हो गये। कालान्तर में राजा हेमांगद पूर्णतः गणेश जी की भक्ति में रम गये तथा अपने पुत्र को राजगद्दी सौंपकर पत्नी सहित परम शान्ति प्राप्त कर ब्रह्मलीन हो गये। तदुपरान्त अन्य मनुष्य भी क्रमशः व्रत की महिमा से स्वानन्दगामी हो गये।"

वशिष्ठ जी कहते हैं - "हे नृपश्रेष्ठ दशरथ! अब फाल्गुन शुक्ल चतुर्थी से सम्बन्धित एक अन्य माहात्म्य का श्रवण कीजिये। प्राचीनकाल में भारक नामक नगर में एक ब्राह्मण निवास करता था, जिसने अपना धर्म भ्रष्ट कर लिया था। वह बाल्यकाल से ही हिंसा, चोरी, क्लेश आदि सभी को कष्ट देने वाले कार्य ही करता था। आयु होने पर वह हत्या एवं बलात्कार जैसे जघन्य अपराध भी करने लगा। वह परस्त्रीगामी था तथा वन्य जीवों की हत्या कर उनका भक्षण करता था। धन आदि लूटने हेतु मनुष्यों एवं ब्राह्मणों की भी हत्या कर देता था।

एक दिन वह अधर्मी वन में भ्रमण कर रहा था। उसने वन में एक वैश्य को आते हुये देखा। वह पापी हत्या के उद्देश्य से उस वैश्य की ओर भागा। उस दुष्ट ब्राह्मण को अपनी ओर आता देख वह वैश्य पुत्र भी भागने लगा तथा तीव्र स्वर से सहायता हेतु लोगों को पुकारने लगा। उसकी पुकार सुनकर मार्ग में जा रहे चार पथिक वहाँ आ गये। उन चारों पुरुषों ने उस ब्राह्मण को बन्धक बनाकर सैनिकों को सौंप दिया। सैनिकों ने उसे बहुत पीटा तथा राज-दरबार में प्रस्तुत कर दिया। राजा ने उस दुष्ट को प्रताड़ित करने का दण्ड दे दिया। तदुपरान्त सैनिकों ने उसे अत्यन्त निर्ममता से पीटा तथा एक गड्ढे में डाल दिया।

उसी बीच फाल्गुन शुक्ल चतुर्थी आ गयी तथा उस दिन भी वह ब्राह्मण निराहार वहाँ पड़ा रहा। क्षुधा एवं सैनिकों की प्रताड़ना के कारण पञ्चमी तिथि को उस ब्राह्मण की मृत्यु हो गयी। मृत्यु होने के उपरान्त गणेश जी के दूत उसे लेने हेतु प्रकट हो गये।

हे नृपश्रेष्ठ दशरथ! भगवान गणेश के दूत उसे स्वानन्दपुर में ले गये जहाँ गणपति का दर्शन करके वह पापी ब्राह्मण भी ब्रह्मभूत हो गया। इस प्रकार चतुर्थी व्रत के प्रभाव से अनेक मनुष्य ब्रह्मभूत हो गये, उन सभी का माहात्म्य वर्णित करना सम्भव नहीं है। अतः फाल्गुन मास की चतुर्थी व्रत के माहात्म्य का जो श्रवण अथवा पाठ करता है, विघ्नहर्ता गणेश जी उसकी सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं।"

॥इस प्रकार श्रीमुद्गलपुराण में वर्णित फाल्गुन शुक्ल चतुर्थी माहात्म्य सम्पूर्ण होता है।

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