Adhik Maas Katha Adhyay 3, Purushottam Maas Katha Adhyay 3

पुरुषोतम मास माहात्म्य/अधिक मास माहात्म्य अध्याय– 3 (Adhik Maas Adhyay 3, Purushottam Maas Adhyay 3)


पुरुषोतम मास माहात्म्य / अधिक मास माहात्म्य अध्याय – 3


adhik maas mahatmya adhyay 3

अधिक मास माहात्म्य, तृतीय अध्याय, मल मास का बैकुठ में जाना

सूतजी के श्री मुख से पवन कथा सुनते हुए ऋषि बोले:-

हे महाभाग! नर के मित्र नारायण नारद के प्रति जो शुभ वचन बोले, वह आप विस्तार पूर्वक हमसे कहें ।

श्री सूतजी जी बोले:-

हे द्विजसत्तमो ! नारायण ने नारद के प्रति जो सुंदर वचन कहे, वह जैसे मैंने सुने हैं वैसे ही कहता हूँ आप लोग सुनो।

नारायण बोले:-

हे नारद! पहले महात्मा श्रीकृष्णचन्द्र ने राजा युधिष्ठिर से जो कहा था वह मैं कहता हूँ सुनो ।

एक समय धार्मिक राजा अजातशत्रु युधिष्ठिर, छलप्रिय धृतराष्ट्र के दुष्टपुत्रों द्वारा द्यूतक्रीड़ा (जुएं) में हार गये। सबके देखते-देखते अग्नि से उत्पन्न हुई धर्मपरायण द्रोपती के बालों को पकड़कर दुष्ट दुशासन ने खींचा, और खींचने के बाद उसके वस्त्र उतारने लगा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसकी रक्षा की। पीछे पांडव राज्य को त्याग काम्यवन में चले गए। वहाँ अत्यंत क्लेश से युक्त वे वन के फलों को खाकर जीवन बिताने लगे।

जैसे जंगली हाथियों के शरीर में बाल रहते हैं इसी प्रकार पांडवों के शरीर में बाल हो गए। इस प्रकार दुखित पांडवों को देखने के लिए भगवान देवकीसुत श्री कृष्ण मुनियों के साथ काम्यवन में गए। उन भगवान को देखकर मृत शरीर में प्राण आ जाने की तरह युधिष्टर, भीमसेन, अर्जुन आदि प्रेम विहल होकर सहसा उठ खड़े हुए और बड़ी ही प्रीति से श्री कृष्ण से मिले, और भगवान कृष्ण के चरण कमलों में भक्ति से नमस्कार करने लगे ।

इसके बाद द्रोपती धीरे-धीरे आई और आलस्य रहित होकर भगवान को शीश झुका कर नमस्कार करने लगी। भगवन श्री कृष्णा ने उन दुखित पांडवों को रूरू मृग के चर्म के वस्त्र पहने देखा, पांड्वो के समस्त शरीर में धूल लगी हुई थी, रूखा शरीर था, चारों तरफ बाल बिखरे हुए थे।

उसी प्रकार द्रोपती को भी दुर्बल शरीर वाली और दुखों से घिरी हुई देखा। इस तरह दुखित पांडवों को देखकर अत्यंत दुखी भक्त वत्सल भगवान धृतराष्ट्र के पुत्रों को जला देने की इच्छा से उन पर क्रोधित हुए। विश्‍व के आत्मा जो भाहों को चढ़ा कर, घूर कर देखने से, करोड़ों काल के कराल मुख की तरह मुखवाले, धधकती हुई प्रलय की अग्नि के समान उठे हुए, ओठों को दाँत के नीचे जोर से दबाकर तीनों लोकों को जला देने की तरह लग रहे थे।

जैसे श्री सीताजी के वियोग से सन्तप्त भगवान् रामचन्द्र को रावण पर जैसा क्रोध आया था उस प्रकार से क्रोधित भगवान् को देखकर काँपते हुए अर्जुन, श्री कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए, द्रोपदी , धर्मराज तथा और लोगों से भी अनुमोदित होकर शीघ्र ही हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे ।

अर्जुन बोले- हे कृष्ण! हे जगन्नाथ ! हे जगत के नाथ ! हे नाथ !

मैं जगत के बाहर नहीं हूँ । आप ही जगत की रक्षा करने वाले हैं, हे प्रभु! क्या मेरी रक्षा आप न करेंगे । जिनके नेत्रों के देखने से ही ब्रह्मा का पतन हो जाता है उनके क्रोध करने से क्या नहीं हो सकता , यह कौन जानता है कि क्रोध से संसार का पालन प्रलय हो जाता है । सम्पूर्ण तत्व को जानने वाले के कारण, वेद और वेदांग के बीज के चित्त आप साक्षात श्री कृष्ण है। मैं आपकी वंदना करता हूँ । आप ईश्वर हैं इस चराचरतात्मक संसार को आपने उत्पन्न किया है, सर्व मंगल के मंगल हैं और सनातन के भी बीज रुप हैं । इसलिए एक जने के अपराध से आप के बनाये समस्त विश्व का आप नाश कैसे करेंगे ? कौन भला ऐसा होगा जो मच्छरौं को जलाने के लिए अपने घर को जला देता हो ?
दूसरों की वीरता को मर्दन करने वाले अर्जुन ने भगवान से इस प्रकार निवेदन कर प्रणाम किया ।

इसके बाद सूत जी ने कहा :-

अर्जुन की ये बाते सुन कर श्री कृष्ण जी ने अपने क्रोध को शांत किया और स्वयं भी चंद्रमा की तरह शान्त हो गए । इस प्रकार भगवान को शान्त देखकर पांडव, भय से मुक्त हो कर प्रेम से प्रसन्न मुख एवं प्रेम विहल हुए। सभी ने भगवान को प्रणाम किया और जंगली कंद , मूल , फल आदि से उनकी पूजा की ।

फिर श्री नारायण भगवान बोले:-

तब शरण में जाने योग्य भक्तों के ऊपर कृपा करने वाले श्री कृष्ण को प्रसन्न जान विशेष प्रेम से भरे हुए नम्र अर्जुन ने उन्हें बारंबार नमस्कार किया और जो प्रश्न आपने हमें किया है वही प्रश्न उन्होंने श्री कृष्ण से किया । इस प्रकार अर्जुन का प्रश्न सुनकर क्षण मात्र मन से सोच कर अपने सुहाद्र पांडवों को और व्रत को धारण की हुई द्रोपती को आश्वासन देते हुए वक्ताओं में श्रेष्ठ श्री कृष्ण पांडवों से हितकर वचन बोले ।

श्री कृष्ण जी बोले:-

हे राजन! हे महाभाग! हे विभव! अब मेरे वचन सुनो । आपने यह प्रश्न अपूर्व किया है । आपको उत्तर देने में मुझे उत्साह हो रहा है। इस प्रश्न का उत्तर गुप्त से गुप्त है, ऋषियों को भी नहीं विदीत है । फिर भी, हे अर्जुन! मित्र के नाते अथवा तुम हमारे भक्त हो इस कारण से हम कहते हैं ।

हे सुब्रत! वह जो उत्तर है वह अति उग्र है, अतः क्रम से सुनो । चैत्रादि जो बारह मास, निमेष, महीने के दोनों पक्ष, घड़ियाँ, प्रहर, त्रिप्रहर, छ ऋतुएँ, मुहूर्त दक्षिणायन और उत्तरायण, वर्ष चारों युग, इसी प्रकार परार्ध तक जो काल है यह सब और नदी, समुद्र, तालाब, कुएँ, बावली, गढ़इयाँ, ,स्त्रोत्र, लता, औषधियों, वृक्ष, बाँस आदि पेड़, वन की औषधियां, नगर, गांव, पर्वत, पुरियाँ यह सब मूर्ति वाले हैं। और अपने गुणों से पूजे जाते हैं इसमें ऐसा कोई अपूर्व व्यक्ति नहीं है। जो अपने अधिष्ठाता देवता के बिना रहता हो ,

अपने अपने अधिकार में पूजे जाने वाले यह सभी फल को देने वाले हैं । अपने-अपने अधिष्ठाता देवता के योग के महात्म्य से यह सब भाग्यवान हैं। हे पांडू ! नंदन एक समय अधिक मास उत्पन्न हुआ । उस उत्पन्न हुए असहाय , निंदित मास को सब लोग बोले कि यह मलमास सूर्य की संक्रांति से रहित है अतः पूजने योग्य नहीं है । यह मलमास, मल रूप होने से छूने योग्य भी नहीं है और न शुभ कार्यों में अग्रणी है.

इस प्रकार के वचनों को लोगों के मुख से सुनकर यह मलमास निरुद्योग , प्रभारहित , दुख से घिरा हुआ , अति खिन्न मन, चिंता से ग्रस्त मन होकर व्यथित हृदय से मरणासन्न की तरह हो गया। फिर यह धैर्य धारण कर मेरी शरण में आया ।

हे नर ! वैकुंठ भवन में जहां मैं रहता था वहां पहुंचा और मेरे पास में आकर मुझे पुराण परम पुरुषोत्तम को इसने देखा। उस समय अमूल्य रत्नों से जड़ित स्वर्ण के सिंहासन पर बैठे मुझको देखकर यह भूमि पर साष्टांग दंडवत कर हाथ जोड़कर नेत्रों में बारंबार आंसुओं की धारा बहता हुआ धैर्य धारण कर गदगद वाणी से बोला।

इतना कहा कर सूतजी बोले – इतनी कथा कह कर भगवन नारायण चुप हो गये । इस प्रकार नारायण के मुख से कथा सुन भक्तों के ऊपर दया करने वाले नारद मुनि पुनः भगवन नारायण को बोले ।

नारदजी बोले- हे प्रभु! इस प्रकार अपनी पूर्णकला से विराजमान भगवान विष्णु के निर्मल भवन में जाकर भक्ति द्वारा मिलने वाले, जगत के पापों को दूर करने वाले, योगियों को भी शीघ्र न मिलने वाले, जगत को अभयदान प्रदान करने वाले, ब्रह्म रूप, मुकुंद जहां पर थे उनके चरण कमलों की शरण में आया हुआ अधिक मास इसके बाद क्या बोला ।

इतिश्री बृहन्नारदीय पुराणे पुरुषोत्तममासेअधिकमासे बैकुंठ पदार्पण नाम तृतीय अध्याय समाप्त ||

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