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Adhik Maas Katha Adhyay 1, Purushottam Maas Katha Adhyay 1

पुरुषोतम मास माहात्म्य/अधिक मास माहात्म्य अध्याय– 1 (Adhik Maas Adhyay 1, Purushottam Maas Adhyay 1)

जय श्री राधे कृष्णा ! 

adhik maas mahatmya adhyay 1

श्री गणेश जी को प्रणाम करते हुए। पुरुषोतम भगवन श्री कृष्णजी, सम्पूर्ण सुष्टि का पालन करने वाले भगवान विष्णु, ज्ञान प्रदान करने वाली सरस्वती माँ, सब पुराणों के कर्ता श्री व्यास जी तथा सभी ज्ञानीजनो के चरण कमलो में नमस्कार करके भगवन की श्रद्धा और भक्ति रस में डूबे पुरुषोतम मास माहात्म्य की कथा कहते है …

सभी पापो से मुक्ति दिलाकर इस लोक में सर्व सुख, धन वैभव, रिधि-सिधि और अंत में मोक्ष प्रदायक है। यह पावन कथा… इतना पावन और महान है की यह कथा स्वयं भगवान नारायण ने देवऋषि नारदजी को अपने श्री मुख से सुनाई थी। बाद में यह कथा राजा परीक्षित एवम सूतजी महाराज ने शुकदेवजी से सुनी थी। बाद में सूतजी महाराज ने यह कथा नैमिषारण्य में अट्ठासी हज़ार ऋषि मुनियों को सुनाई थी।

उसी शास्त्रोक्त कथा का सरल हिंदी भाषा में रूपांतरण इस पवित्र पुरुषोतम मास में हम पढेंगे और इस कथा को रोज पठने और सुनने वाला प्राणी सभी पापो से मुक्त होकर अंत में पुरुषोतम भगवन के गोलोक में अनंतकाल तक वास करता है और वह सदैव के लिए आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाता है, यह स्वयं भगवान का कथन है याद रखना पुरुषोतम भगवन श्री कृष्णा, भगवन विष्णु और शिवजी परम कृपालु बने रहते है हर उस प्राणी पर जो श्रद्धापूर्वक इस कथा को नियम से पड़ता सुनता है।
अब कथा का शुभारम्भ करते है :-

श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीगुरुभ्यो नमः ॥ श्रीगोपीजनवल्‍लभाय नमः ॥ वन्दे वन्दारुमन्दारं वृन्दावनविनोदिनम्‌ ॥ वृन्दावनकलानाथं पुरुषोत्तममद्‌भुतम्‌ ॥ १ ॥

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्‌ ॥ देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्‌ ॥ २ ॥

नैमिषायण्यमाजग्मुर्मुनयः सत्रकाम्यया ॥ असितो देवलः पैलः सुमन्तुः पिप्पलायनः ॥ ३ ॥

सुमतिः काश्यपश्चैव जाबालिर्भृगुरङ्गिराः ॥ वामदेवः सुतीक्ष्णश्च शरभङ्गश्च पर्वतः ॥ ४ ॥

आपस्तम्बोऽथमाण्डव्योऽगस्त्यः कात्यायनस्तथा ॥ रथीतरो ऋभुश्चैव कपिलो रैभ्य एव च ॥ ५ ॥

पुरुषोतम मास माहात्म्य / अधिक मास माहात्म्य अध्याय – 1

वन्दे वन्दारु मन्दारं, वृन्दावन विनोदितम..

वृन्दावन कलानाथम, पुरुषोतम अदभुतम…

अधिक मास माहात्म्य, प्रथम अध्याय,

नैमिषारण्य में शुकदेव जी का आगमन

कल्प वृक्ष के समान भक्तजनों के सभी मनोरथ पूर्ण करने वाले, वृंदावन की शोभा के अधिपति, आलोकिक कार्यो द्वारा, समस्त लोको को चकित करने वाले, वृंदावन बिहारी पुरुषोत्तम भगवान को नमस्कार करते है। नारायण, नर, नरोत्तम तथा देवी सरस्वती और श्रीव्यासजी को प्रणाम करके मै जप लाभ की कामना करती हूँ।

एक समय बहुत बड़ा यज्ञ करने की इच्छा से परम पवित्र नैमिषारण्य तीर्थ में बहुत से मुनि आये। जैसे – असित, देवल, पैल, सुमन्तु, पिप्पलायन, ऋषि सुमति, कश्यप, जाबालि, भृगु, अंगिरा, वामदेव, सुतीक्ष्ण, शरभंग, पर्वत , ऋषि आपस्तम्ब, माण्डव्य, अगस्त्य, कात्यायन, रथीतर, ऋभु, कपिल, रैभ्य , ऋषि गौतम, मुद्गल, कौशिक, गालव, क्रतु, अत्रि, बभ्रु, त्रित, शक्ति, बधु, बौधायन, वसु , ऋषि कौण्डिन्य, पृथु, हारीत, ध्रूम, शंकु, संकृति, शनि, विभाण्डक, पंक, गर्ग, काणाद , ऋषि जमदग्नि, भरद्वाज, धूमप, मौनभार्गब, कर्कश, शौनक तथा महातपस्वी शतानन्द , ऋषि विशाल, वृद्धविष्णु, जर्जर, जय, जंगम, पार, पाशधर, पूर, महाकाय, जैमिनि , ऋषि महाग्रीव, महाबाहु, महोदर, महाबल, उद्दालक, महासेन, आर्त, आमलकप्रिय , ऋषि ऊर्ध्वबाहु, ऊर्ध्वपाद, एकपाद, दुर्धर, उग्रशील, जलाशी, पिंगल, अत्रि, ऋभु , ऋषि शाण्डीर, करुण, काल, कैवल्य, कलाधार, श्‍वेतबाहु, रोमपाद, कद्रु, कालाग्निरुद्रग, ऋषि श्‍वेताश्‍वर, आद्य, शरभंग, पृथुश्रवस् आदि शिष्यों के सहित ये सब ऋषि अंगों के सहित वेदों को जानने वाले, ब्रह्मनिष्ठ, संसार की भलाई तथा परोपकार करने वाले, दूसरों के हित में सर्वदा तत्पर, श्रौत, स्मार्त कर्म करने वाले ये सभी ऋषि अपने शिष्यों के साथ एकत्रित हुए।

इधर तीर्थयात्रा की इच्छा से सूतजी अपने आश्रम से निकले और पृथ्वी का भ्रमण करते हुए उसी समय वो भी अपने शिष्यों के साथ नैमिष शरण पधारे…

उन्होंने अनन्तर पेड़ की लाल छाल को धारण किया हुआ था वे प्रसन्न मुख,शांत, परमार्थ, विशारद, समग्र आदि गुणों से युक्त, संपूर्णा आनन्दों से परिपूर्ण, तुलसी की माला से सुशोभित, जटा के मुकुट से विभूषित, समस्त आपत्तियों से रक्षा करने वाले अलौकिक चमत्कार को दिखाने वाले भगवान के परम मंत्र को जपते हुए, समस्त शास्त्रों के सार को जानने वाले, संपूर्ण प्राणियों के हित में संलग्न, जितेंद्रिय तथा क्रोध को जीतने वाले, जीवन्मुक्त जगतगुरु श्री व्यासजी की तरह और उन्हीं की तरह निस्पृह आदि गुणों से युक्त सूतजी महाराज शोभायमान हो रहे थे…

उनको देख उस नेमिषारण्य में रहने वाले समस्त महर्षि गण उठ खड़े हुए। सभी मुनिगण हाथ जोड़कर बोले –

हे सूतजी महराज!

आप चिरायु हो.. आपके लिए ये मनोहर आसन है आप इस पर विराजमान हो.. ये कह कर सभी ऋषि मुनि बैठ गए… तब नम्र स्वभाव वाले सुत जी ने प्रसन्न हो कर सब ऋषियोँ को हाथ जोड़कर बारंबार दंडवत प्रणाम किया।

ऋषि लोग बोले –

हे सूतजी! आप चिरन्जीवी तथा भगवद्भक्त होवो। हम लोगों ने आपके योग्य सुन्दर आसन लगाया है। हे महाभाग! आप थके हैं, यहाँ बैठ जाइये, ऐसा सब ब्राह्मणों ने कहा। इस प्रकार बैठने के लिए कहकर जब सब तपस्वी और समस्त जनता बैठ गयी।

तब विनयपूर्वक तपोवृद्ध समस्त मुनियों से बैठने की अनुमति लेकर प्रसन्न होकर आसन पर सूतजी बैठ गए।
तदनन्तर सूतजी को सुखपूर्वक बैठे हुए और श्रमरहित देखकर पुण्यकथाओं को सुनने की इच्छा वाले समस्त ऋषि बोले।

ऋषि बोले हे सुत जी! हे महाभाग!

आप भाग्यवान है.. भगवान व्यास के वचनों के हार्दिक अभिप्राय को गुरु की कृपा से आप जानते हैं। क्या आप सुखी तो है? आज बहुत दिनों के बाद कैसे इस वन में पधारें? आप प्रशंसा के पात्र हैं… हे व्यास शिष्य शिरोमणि आप पूज्य है!

इस असार संसार में सुनने योग्य हजारों विषय हैं परंतु उनमे श्रयस्कर थोड़ा- सा और सारभूत जो हो वह हम लोगों से कहिए। हे महाभाग! संसार समुद्र में डूबते हुए को पार करने वाला तथा शुभ फल देने वाला आपके मन मैं निश्चित विषय जो हो, वही हम लोगों से कहिए… अज्ञान रुप अंधकार से अंधे हुओ को ज्ञान रूप चक्षु देने वाले भगवान के लीला रूपी रस से युक्त परमानंद का कारण संसार रूपी लोगों को दुख दूर करने में रसायन के समान जो कथा का सार है वह शीघ्र ही कहिए।

इस प्रकार शौनक आदि ऋषियोँ के पूछने पर हाथ जोड़कर

सुत जी बोले:-

हे समस्त मुनियों ! मेरी कही हुई सुंदर कथा को आप लोग सुनिए। हे विप्र! पहले मैं पुष्कर तीर्थ को गया, वहां स्नान करके पवित्र ऋषियों देवताओं तथा पितरों को तर्पण आदि से तृप्त करके तब समस्त प्रतिबंधों को दूर करने वाली यमुना के तट पर गया, फिर क्रम से अन्य तीर्थों में जाकर गंगा तट पर गया, पुनः काशी आकर अनन्तर गया तीर्थ पर गया… पितरों का श्राद्ध करके तब त्रिवेणी पर गया.. तदन्तर कृष्णा के बाद गंडकी में स्नान कर पुलह ऋषि के आश्रम पर गया…

फिर कृतमाला कावेरी निर्वन्धिया, तामृणिका, तापी, वैहायसी, नन्द, नर्मदा, शर्मदा,नदियों पर गया। पुनः चर्मण्वती में स्नान कर पीछे सेतुबंध रामेश्वर पहुंचा। तदनंतर नारायण का दर्शन करने के हेतु बद्री वन गया। तब नारायण का दर्शन कर वहां तपस्वियों को अभिनंदन कर पुनः नारायण को नमस्कार कर और उनकी स्तुति कर सिद्धक्षेत्र पहुंचा.. इस प्रकार बहुत क्षेत्रों में घूमता हुआ कुरुक्षेत्र तथा जाड्गलं देश में घूमता फिरता हुआ हस्तिनापुर में गया है।

द्विजों वहां यह सुना कि राजा परीक्षित राज्य का त्याग कर बहुत से ऋषि मुनियों के साथ पुण्यप्रद गंगा तीर पर गए हैं। और उस गंगा तट पर बहुत से सिद्ध सिद्धि है। भूषण जिनका ऐसे योगी लोग और देव ऋषि वहां पर आए हैं। उसमे कोई निराहार, कोई वायु भक्षण कर, कोई जल पी कर, कोई पत्ते खाकर, कोई श्वास ही को आहार कर, कोई फलाहार का, और कोई कोई फेन का आहार कर रहते है।
हे द्विजों! उस समाज में कुछ पूछने की इच्छा से हम भी गए… वहां ब्रम्हस्वरूप भगवान महामुनि व्यास के पुत्र बड़े तेज वाले बड़े प्रतापी श्री कृष्ण के चरण कमलों को मन से धारण किए हुए श्री शुकदेव जी आए। उन 16 वर्ष के योगीराज शंख की तरह कंठ वाले, बड़े लंबे चिकने बालो से घिरे हुए मुख वाले, बड़ी पुष्ट कंधों की संधि वाले, चमकती हुई कांति वाले, अवधूत रूप वाले, ब्रह्म रूप वाले युवा से घिरे हुए। महामुनि शुकदेवजी को देख सब मुनि प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर सहसा उठ खड़े हो गए। इस प्रकार महा मुनियों के द्वारा सत्कृत भगवान शुकदेव जी को देख कर पश्चाताप करती हुई स्त्रियां और साथ के बालक जो उनको देख रहे थे, दूर हो खड़े रह गए और भगवान शुकदेव को प्रणाम करके अपने अपने घर की प्रति जाते रहे।

इधर मुनि लोगों ने शुकदेवजी के लिए बड़ा ऊंचा और उत्तम आसन बिछाया… इस आसन पर बैठे भगवान शुकदेवजी को कमल की कर्णिका की जैसे कमल के पत्ते में रहती है उस प्रकार मुनि लोग उनको घेर कर बैठ गए… वहाँ बैठे हुए ज्ञान रूप महासागर के चंद्रमा भगवान महामुनि व्यास जी के पुत्र शुकदेव जी ब्राह्मणों के द्वारा की हुई पूजा को धारण कर तारागणों से घिरे हुए चंद्रमा की तरह शोभा को प्राप्त होते थे।

।।इति श्री वृहन्नारदीय पुरुषोत्तम मास माहात्म्य में शुकदेवजी का आगमन नामक प्रथम अध्याय समाप्त।।

Adhik Maas Katha Adhyay 2, Purushottam Maas Katha Adhyay 2

पुरुषोतम मास माहात्म्य/अधिक मास माहात्म्य अध्याय– 2 (Adhik Maas Adhyay 2, Purushottam Maas Adhyay 2)


पुरुषोतम मास माहात्म्य / अधिक मास माहात्म्य अध्याय – 2


adhik maas mahatmya adhyay 2

सूतजी बोले–

राजा परीक्षित के पहुंचने पर भगवान शुकदेवजी द्वारा कथित पुण्यप्रद श्रीमद् भागवत कथा, श्री शुकदेवजी जी के द्वारा सुनकर, तथा राजा का मोक्ष देखकर, अब मै यहां यज्ञ करने के लिए उद्यत ब्राह्मणों को देखने के लिए आया हूँ… अब यहां यज्ञ में दीक्षा लिए हुए ब्राह्मणों का दर्शन कर मैं कृतार्थ हुआ।

ऋषि बोले:-

हे साधो! अन्य विषय की बातों को त्यागकर, भगवान् कृष्णद्वैपायन के श्री मुख से आपने जो सुना है वही अपूर्व विषय है… इसलिए हे सूतजी! आप हम लोगों से वे सब कहिये॥
फिर ऋषि बोले – हे महाभाग! संसार में जिससे परे कोई सार नही है, ऐसी मन को प्रसन्न करने वाली और जो सुधा से भी अधिकतर हितकर है ऐसी पुण्य कथा हम लोगों को सुनाइये।


सुत जी बोले:-

विलोम (अथार्त ब्राह्मण के चारु में क्षत्रिय चुरू मिल जाने से) उत्पन्न होने पर भी मैं धन्य हूँ.. जो श्रेष्ठ पुरूष होने पर भी आप लोग मुझसे पूछ रहे हैं। भगवान व्यास के मुख से जो कुछ मैंने सुना है। वह यथा ज्ञान मैं कहता हूँ।


एक समय नारद मुनि नर-नारायण के आश्रम में गए। जो आश्रम बहुत से तपस्वियों, सिद्धों तथा देवताओं से भी युक्त है। और खैर, बहेड़ा, आंवला, बेल, आम, अमड़ा, केच, जामुन, कदंब आदि और भी अन्य वृक्षों से सुशोभित है। भगवान विष्णु के चरणों से निकली हुई पवित्र गंगा और अलकनंदा भी जहाँ बह रही हैं।
ऐसे नर, नारायण के स्थान में श्री नारद मुनि ने जाकर महामुनि नारायण को प्रणाम किया। और परब्रम्ह की चिंता में लगा हुआ है मन जिनका, ऐसे जितेंद्रिय, काम, क्रोध आदि छहों शत्रुओ को जीते हुए, जिनकी प्रभा अत्यंत निर्मल चमक रही हैं, ऐसे देवताओं के भी देव, तपस्वी नारायण को साष्टांग दंडवत प्रणाम कर और हाथ जोड़कर नारद मुनि व्यापक प्रभु की स्तुति करने लगे।

नारद जी बोले :-

हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे कृपासागर सत्पते! आप सत्यव्रत हो, त्रिसत्य हो, सत्य आत्मा हो, और सत्यसम्भव हो.. है सत्ययोने! आपको नमस्कार है। मैं आपकी शरण में आया हूँ। आपका जो तप है वह संपूर्ण प्राणियों की शिक्षा के लिए और मर्यादा की स्थापना के लिए है। यदि आप तपस्या ना करें तो कलयुग में एक के पाप करने से सारी पृथ्वी डूबती है वैसे ही एक के पुण्य करने से सारी पृथ्वी तरती है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है।

पहले सतयुग आदि में, जैसे एक पाप करता था तो सभी पापी हो जाते थे, ऐसी स्थिति हटाकर कलयुग में केवल करता ही पापों से लिप्त होता है, वह आपके तप की स्थिति है।

हे भगवान ! कलियुग में जितने प्राणी हैं सब विषयों में आसक्त हैं। स्त्री पुरुष ग्रह में लगा है चित्त जिनका, ऐसी प्राणियों का हित करने वाला, जो हो और जिस से मेरा भी थोड़ा कल्याण हो सके, ऐसा विषय सोचकर, आपका मुझ से कहने के योग्य हैं । आप के मुख से सुनने की इच्छा से मैं ब्रह्मलोक से यहाँ आया हूँ। उपकार प्रिय विष्णु हैं। ऐसा वेदों में निश्रित है इसलिए लोक उपकार के लिए कथा का सार इस समय आप सुनाइए, जिसके श्रवण मात्र से निर्भय मोक्ष पद की प्राप्ति होती है ।

इस प्रकार नारद जी के वचनों को सुनकर भगवान ऋषि आनंद से खिलखिला उठे और भुवन को पवित्र करने वाली पुण्य कथा आरंभ की ।

गोपों की स्त्रियों के मुख कमल के भ्रमर, रास के ईश्वर, रसिकों के आभरण वृंदावन बिहारी, ब्रिज के पति, आदि पुरुष भगवान की पुण्य कथा को कहते हैं ।

श्री नारायण बोले:-

हे नारद! आप सुनो जो निमित्त मात्र समय मे जगत को उत्पन्न करने वाले है उनके कर्मों को हे वत्स! इस पृथ्वी पर कौन वर्णन कर सकता है ?
हे नारद मुनि ! आप भी भगवान के चरित्र का सरस सार जानते हैं । और यह भी जानते हैं कि भगवान चरित्र वाणी द्वारा नहीं कहा जा सकता.. यद्यपि अद्भुत पुरुषोत्तम माहात्म्य आदर से कहते हैं । यह पुरुषोत्तम माहात्म्य दरिद्रता और वैधव्य का नाश करने वाला, यश का दाता, सत पुत्र और मोक्ष को देने वाला है । अतः शीघ्र ही इसका प्रयोग करना चाहिए ।

नारदजी बोले –

हे मुने ! पुरुषोत्तम नामक कौन देवता है ? उसका माहात्म्य क्या है ? यह अद्भुत सा प्रतीत होता है , अतः आप मुझे विस्तार पूर्वक कहिए ।

सूतजी बोले:-

श्री नारदजी का वचन सुनकर नारायण क्षण मात्र पुरुषोत्तम में अच्छी तरह मन लगाकर बोले

श्री नारायण बोले:-

पुरुषोत्तम यह मास का नाम जो पड़ा है वह भी कारण से युक्त है। पुरुषोत्तम मास के स्वामी दयासागर पुरुषोत्तम ही हैं । इसलिए ऋषिगण इसको पुरुषोत्तम मास कहते हैं । पुरुषोत्तम मास के व्रत करने से भगवान पुरुषोत्तम प्रसन्न होते हैं ।

नारदजी बोले:-

चैत्र आदि मास जो है वह अपने-अपने स्वामियों देवताओं से युक्त हैं । ऐसा मैंने सुना है परंतु उनके बीच में पुरुषोत्तम नाम का मास नहीं सुना है । पुरुषोत्तम मास कौन है ? और पुरुषोत्तम मास के स्वामी कृपा के निधि पुरुषोत्तम कैसे हुए ? हे कृपानिधि ! आप मुझे इस मास का स्वरुप विधान के सहित कहिये… हे प्रभु सत्पते ! इस माह में क्या करना ? कैसे स्नान करना ? क्या दान करना ? इस मास का जप पूजा उपवास आदि क्या साधन है ? कहिये ? इस मास के विधान से कौन से देवता प्रसन्न होते हैं ? और क्या फल देते हैं ? इसके अतिरिक्त और जो कुछ भी तथ्य हो वह है तपोधन ! कृप्या सब मुझ से कहिये।

साधु दोनों के ऊपर कृपा करने वाले होते हैं । वह बिना पूछे कृपा करके सदुपदेश दिया करते हैं । इस पृथ्वी पर जो मनुष्य दूसरों के भाग्य के अनुवर्ती दरिद्रता से पीड़ित नित्य रोगी रहने वाले, पुत्रों को चाहने वाले, जड़, गूँगे, ऊपर से अपने को बड़ा धार्मिक दर्शाने वाले, विद्या विहीन मलिन वस्त्रों को धारण करने वाले, नास्तिक परस्त्रीगामी, नीच जर्जर दासवृत्ति करने वाले,आशा जिनकी नष्ट हो गई है, संकल्प जिनके भ्रष्ट हो गये हैं, तत्व जिनके क्षीण हो गए हैं , कुरूपी, रोगी, कुश्टी, टेढ़े-मेढ़े अंगों वाले, अंधे, इष्टवियोग, मित्रवियोग, स्त्रीवियोग, आतपुरुषयोग, माता-पिता विहीन, शोक- दुख आदि से जिनके अंग सूख गए हैं, अपने इष्ट वस्तु से रहित उत्पन्न हुआ करते हैं, वैसे जिन अनुष्ठानों के करने और सुनने से, पुनः उत्पन्न न हो, हे प्रभु ! ऐसे प्रयोग हमको सुनाइए।

संसार की विचित्र दशा देख कर दुखी हूँ मानव स्वार्थ से भर गया है और कितने ही दुखो से घिरा हुआ है। महामारी , वैधव्य, वन्ध्या दोष, आँगहीनता, दुष्ट व्याधियां, राज्यक्षमादी जो दोष हैं, इन दोषों से दुखित मनुष्य को देख कर, हे जगन्नाथ! मैं दुखी हुँ।

अतः मेरे ऊपर दया करके, हे ब्राह्मण! मेरे मन को प्रसन्न करने वाले विषय को विस्तार से बताइए… हे प्रभु! आप सर्वज्ञ हैं, समय से तत्वों के आयतन हैं ।

इस के बाद सूतजी कहते हैं:-

इस प्रकार नारद के परोपकारी मधुर वचनों को सुनकर देवादेव नारायण, चंद्रमा की तरह शांत हो कर, महा मुनि नारदजी से नए मेघों के समान गंभीर वचन बोले ।

इति श्री बृहन्नारदीये पुरुषोत्तम मास में नारायण नारद संवाद प्रश्न विधि विधि नामक द्वितीय अध्याय(chapter-2) संपूर्ण।

Adhik Maas Katha Adhyay 3, Purushottam Maas Katha Adhyay 3

पुरुषोतम मास माहात्म्य/अधिक मास माहात्म्य अध्याय– 3 (Adhik Maas Adhyay 3, Purushottam Maas Adhyay 3)


पुरुषोतम मास माहात्म्य / अधिक मास माहात्म्य अध्याय – 3


adhik maas mahatmya adhyay 3

अधिक मास माहात्म्य, तृतीय अध्याय, मल मास का बैकुठ में जाना

सूतजी के श्री मुख से पवन कथा सुनते हुए ऋषि बोले:-

हे महाभाग! नर के मित्र नारायण नारद के प्रति जो शुभ वचन बोले, वह आप विस्तार पूर्वक हमसे कहें ।

श्री सूतजी जी बोले:-

हे द्विजसत्तमो ! नारायण ने नारद के प्रति जो सुंदर वचन कहे, वह जैसे मैंने सुने हैं वैसे ही कहता हूँ आप लोग सुनो।

नारायण बोले:-

हे नारद! पहले महात्मा श्रीकृष्णचन्द्र ने राजा युधिष्ठिर से जो कहा था वह मैं कहता हूँ सुनो ।

एक समय धार्मिक राजा अजातशत्रु युधिष्ठिर, छलप्रिय धृतराष्ट्र के दुष्टपुत्रों द्वारा द्यूतक्रीड़ा (जुएं) में हार गये। सबके देखते-देखते अग्नि से उत्पन्न हुई धर्मपरायण द्रोपती के बालों को पकड़कर दुष्ट दुशासन ने खींचा, और खींचने के बाद उसके वस्त्र उतारने लगा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसकी रक्षा की। पीछे पांडव राज्य को त्याग काम्यवन में चले गए। वहाँ अत्यंत क्लेश से युक्त वे वन के फलों को खाकर जीवन बिताने लगे।

जैसे जंगली हाथियों के शरीर में बाल रहते हैं इसी प्रकार पांडवों के शरीर में बाल हो गए। इस प्रकार दुखित पांडवों को देखने के लिए भगवान देवकीसुत श्री कृष्ण मुनियों के साथ काम्यवन में गए। उन भगवान को देखकर मृत शरीर में प्राण आ जाने की तरह युधिष्टर, भीमसेन, अर्जुन आदि प्रेम विहल होकर सहसा उठ खड़े हुए और बड़ी ही प्रीति से श्री कृष्ण से मिले, और भगवान कृष्ण के चरण कमलों में भक्ति से नमस्कार करने लगे ।

इसके बाद द्रोपती धीरे-धीरे आई और आलस्य रहित होकर भगवान को शीश झुका कर नमस्कार करने लगी। भगवन श्री कृष्णा ने उन दुखित पांडवों को रूरू मृग के चर्म के वस्त्र पहने देखा, पांड्वो के समस्त शरीर में धूल लगी हुई थी, रूखा शरीर था, चारों तरफ बाल बिखरे हुए थे।

उसी प्रकार द्रोपती को भी दुर्बल शरीर वाली और दुखों से घिरी हुई देखा। इस तरह दुखित पांडवों को देखकर अत्यंत दुखी भक्त वत्सल भगवान धृतराष्ट्र के पुत्रों को जला देने की इच्छा से उन पर क्रोधित हुए। विश्‍व के आत्मा जो भाहों को चढ़ा कर, घूर कर देखने से, करोड़ों काल के कराल मुख की तरह मुखवाले, धधकती हुई प्रलय की अग्नि के समान उठे हुए, ओठों को दाँत के नीचे जोर से दबाकर तीनों लोकों को जला देने की तरह लग रहे थे।

जैसे श्री सीताजी के वियोग से सन्तप्त भगवान् रामचन्द्र को रावण पर जैसा क्रोध आया था उस प्रकार से क्रोधित भगवान् को देखकर काँपते हुए अर्जुन, श्री कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए, द्रोपदी , धर्मराज तथा और लोगों से भी अनुमोदित होकर शीघ्र ही हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे ।

अर्जुन बोले- हे कृष्ण! हे जगन्नाथ ! हे जगत के नाथ ! हे नाथ !

मैं जगत के बाहर नहीं हूँ । आप ही जगत की रक्षा करने वाले हैं, हे प्रभु! क्या मेरी रक्षा आप न करेंगे । जिनके नेत्रों के देखने से ही ब्रह्मा का पतन हो जाता है उनके क्रोध करने से क्या नहीं हो सकता , यह कौन जानता है कि क्रोध से संसार का पालन प्रलय हो जाता है । सम्पूर्ण तत्व को जानने वाले के कारण, वेद और वेदांग के बीज के चित्त आप साक्षात श्री कृष्ण है। मैं आपकी वंदना करता हूँ । आप ईश्वर हैं इस चराचरतात्मक संसार को आपने उत्पन्न किया है, सर्व मंगल के मंगल हैं और सनातन के भी बीज रुप हैं । इसलिए एक जने के अपराध से आप के बनाये समस्त विश्व का आप नाश कैसे करेंगे ? कौन भला ऐसा होगा जो मच्छरौं को जलाने के लिए अपने घर को जला देता हो ?
दूसरों की वीरता को मर्दन करने वाले अर्जुन ने भगवान से इस प्रकार निवेदन कर प्रणाम किया ।

इसके बाद सूत जी ने कहा :-

अर्जुन की ये बाते सुन कर श्री कृष्ण जी ने अपने क्रोध को शांत किया और स्वयं भी चंद्रमा की तरह शान्त हो गए । इस प्रकार भगवान को शान्त देखकर पांडव, भय से मुक्त हो कर प्रेम से प्रसन्न मुख एवं प्रेम विहल हुए। सभी ने भगवान को प्रणाम किया और जंगली कंद , मूल , फल आदि से उनकी पूजा की ।

फिर श्री नारायण भगवान बोले:-

तब शरण में जाने योग्य भक्तों के ऊपर कृपा करने वाले श्री कृष्ण को प्रसन्न जान विशेष प्रेम से भरे हुए नम्र अर्जुन ने उन्हें बारंबार नमस्कार किया और जो प्रश्न आपने हमें किया है वही प्रश्न उन्होंने श्री कृष्ण से किया । इस प्रकार अर्जुन का प्रश्न सुनकर क्षण मात्र मन से सोच कर अपने सुहाद्र पांडवों को और व्रत को धारण की हुई द्रोपती को आश्वासन देते हुए वक्ताओं में श्रेष्ठ श्री कृष्ण पांडवों से हितकर वचन बोले ।

श्री कृष्ण जी बोले:-

हे राजन! हे महाभाग! हे विभव! अब मेरे वचन सुनो । आपने यह प्रश्न अपूर्व किया है । आपको उत्तर देने में मुझे उत्साह हो रहा है। इस प्रश्न का उत्तर गुप्त से गुप्त है, ऋषियों को भी नहीं विदीत है । फिर भी, हे अर्जुन! मित्र के नाते अथवा तुम हमारे भक्त हो इस कारण से हम कहते हैं ।

हे सुब्रत! वह जो उत्तर है वह अति उग्र है, अतः क्रम से सुनो । चैत्रादि जो बारह मास, निमेष, महीने के दोनों पक्ष, घड़ियाँ, प्रहर, त्रिप्रहर, छ ऋतुएँ, मुहूर्त दक्षिणायन और उत्तरायण, वर्ष चारों युग, इसी प्रकार परार्ध तक जो काल है यह सब और नदी, समुद्र, तालाब, कुएँ, बावली, गढ़इयाँ, ,स्त्रोत्र, लता, औषधियों, वृक्ष, बाँस आदि पेड़, वन की औषधियां, नगर, गांव, पर्वत, पुरियाँ यह सब मूर्ति वाले हैं। और अपने गुणों से पूजे जाते हैं इसमें ऐसा कोई अपूर्व व्यक्ति नहीं है। जो अपने अधिष्ठाता देवता के बिना रहता हो ,

अपने अपने अधिकार में पूजे जाने वाले यह सभी फल को देने वाले हैं । अपने-अपने अधिष्ठाता देवता के योग के महात्म्य से यह सब भाग्यवान हैं। हे पांडू ! नंदन एक समय अधिक मास उत्पन्न हुआ । उस उत्पन्न हुए असहाय , निंदित मास को सब लोग बोले कि यह मलमास सूर्य की संक्रांति से रहित है अतः पूजने योग्य नहीं है । यह मलमास, मल रूप होने से छूने योग्य भी नहीं है और न शुभ कार्यों में अग्रणी है.

इस प्रकार के वचनों को लोगों के मुख से सुनकर यह मलमास निरुद्योग , प्रभारहित , दुख से घिरा हुआ , अति खिन्न मन, चिंता से ग्रस्त मन होकर व्यथित हृदय से मरणासन्न की तरह हो गया। फिर यह धैर्य धारण कर मेरी शरण में आया ।

हे नर ! वैकुंठ भवन में जहां मैं रहता था वहां पहुंचा और मेरे पास में आकर मुझे पुराण परम पुरुषोत्तम को इसने देखा। उस समय अमूल्य रत्नों से जड़ित स्वर्ण के सिंहासन पर बैठे मुझको देखकर यह भूमि पर साष्टांग दंडवत कर हाथ जोड़कर नेत्रों में बारंबार आंसुओं की धारा बहता हुआ धैर्य धारण कर गदगद वाणी से बोला।

इतना कहा कर सूतजी बोले – इतनी कथा कह कर भगवन नारायण चुप हो गये । इस प्रकार नारायण के मुख से कथा सुन भक्तों के ऊपर दया करने वाले नारद मुनि पुनः भगवन नारायण को बोले ।

नारदजी बोले- हे प्रभु! इस प्रकार अपनी पूर्णकला से विराजमान भगवान विष्णु के निर्मल भवन में जाकर भक्ति द्वारा मिलने वाले, जगत के पापों को दूर करने वाले, योगियों को भी शीघ्र न मिलने वाले, जगत को अभयदान प्रदान करने वाले, ब्रह्म रूप, मुकुंद जहां पर थे उनके चरण कमलों की शरण में आया हुआ अधिक मास इसके बाद क्या बोला ।

इतिश्री बृहन्नारदीय पुराणे पुरुषोत्तममासेअधिकमासे बैकुंठ पदार्पण नाम तृतीय अध्याय समाप्त ||

Adhik Maas Katha Adhyay 4, Purushottam Maas Katha Adhyay 4

पुरुषोतम मास माहात्म्य/अधिक मास माहात्म्य अध्याय– 4 (Adhik Maas Adhyay 4, Purushottam Maas Adhyay 4)

पुरुषोतम मास माहात्म्य / अधिक मास माहात्म्य अध्याय – 4


जय श्री राधे कृष्णा ! 

adhik maas mahatmya adhyay 4

अधिक मास माहात्म्य, चतुर्थ अध्याय, मल मास का बैकुठ में जाना और भगवान श्री हरि को अपनी व्यथा बताना

इसके बाद भगवान श्री नारायण बोले:-

हे नारद! भगवान् श्री हरि ने जो शुभ वचन अधिमास से कहे वह लोगों के कल्याण की इच्छा से हम तुम्हे कहते हैं, सुनो ॥ १ ॥

बैकुंठ लोक में भगवन की अनेक प्रकार से स्तुतिया और बारम्बार नमस्कार करने के पश्चात् अधिकमास ने भगवान से करबद्ध होकर निवेदन किया –हे नाथ! हे कृपानिधे! हे हरे! मेरे से जो बलवान् हैं उन्होंने ‘यह मलमास है’ ऐसा कहकर मुझ दीन को अपनी श्रेणी से निकाल दिया है।

मै आपकी शरण हूँ , बलिष्ट लोग मुझे मलमास कहते है और मेरा निरादर करते है। मुझे स्वमिराहित और मलिन कहकर शुभ कर्मो के निमित मेरा त्याज्य किया हुआ है। हे दीनवत्सल भगवन! कंस की कोपग्नी से जिस प्रकार अपने वासुदेव की पत्नी देवकी को सुरक्षित किया, आप वैसे मेरी रक्षा क्यों नहीं करते? यमुना में कालिय नाग के विष से गौ चरानेवालों तथा पशुओं की आपने जैसे रक्षा की वैसे हे दीनबंधु! आप मुझ शरणागत की रक्षा क्यों नहीं करते? पशु और पशुओं को पालने वालों एवं पशुपालकों की स्त्रियों की जैसे पहिले व्रज में सर्पतके वन में लगी हुई अग्नि से आपने रक्षा की वैसे हे दीनवत्सल! कहिये मुझ शरण आये हुए की क्यों रक्षा नहीं करते ॥ ७ ॥

जैसे अपने जरासंध के बंधन से राजाओ को मुक्त किया, ग्राह के मुख से जिस प्रकार गज को मुक्ति दिलाई, उसी प्रकार शरण में आये हुए मुझ दीन की रक्षा क्यों नहीं करते?

अपने स्वामी देवता वाले मासों द्वारा शुभ कर्म में वर्जित, मुझ स्वामिरहित को देखते ही आपकी दयालुता कहाँ चली गयी और आज यह कठोरता कैसे आ गयी? ॥ ३ ॥
इस प्रकार भांति भांति से मल मास भगवन से विनती करता रहा..

श्रीनारायण बोले:-

इस प्रकार भगवान्‌ को कह कर स्वामीरहित मलमास, आँसू बहता मुख लिये जगत्पति के सामने चुपचाप खड़ा रहा ॥ १० ॥
उसको रोते देखते ही भगवान् शीघ्र ही दयार्द्र हो गये और पास में खड़े दीनमुख मलमास से बोले ॥ ११ ॥

श्रीहरि बोले :-

हे वत्स! तुम अति शोकाकुल हो.. यह महान शोक जिससे तुम व्याकुल हो, कौन सा है.. तुम अब शोक को त्याग दो.. क्युकी यहाँ आकर महादुःखी नीच भी शोक नहीं करता फिर  तुम कैसे यहाँ आकर शोक में मन को दबाये हुए हो ॥

जहाँ आने से न शोक होता है, न कभी बुढ़ौती आती है, न मृत्यु का भय रहता है, यहाँ हमेशा नित्य आनन्द रहा करता है। इस प्रकार के बैकुण्ठ में आकर तुम कैसे दुःखित हो? ॥ १५ ॥ तुमको यहाँ पर दुःखित देखकर वैकुण्ठवासी बड़े विस्मय को प्राप्त हो रहे हैं, हे वत्स! तुम कहो इस समय तुम मरने की क्यों इच्छा करते हो? ॥ १६ ॥

श्रीनारायण बोले:-

इस प्रकार भगवान् के वाक्य सुनकर बोझा लिये हुए आदमी जैसे बोझा रख कर श्‍वास पर श्‍वास लेता है इसी प्रकार श्‍वासोच्छ्‌वास लेकर – अधिमास मधुसूदन से बोला ॥

अधिमास बोला:-

हे भगवन्! आप सर्वव्यापी हैं, आप से अज्ञात कुछ नहीं है, आकाश की तरह आप विश्‍व में व्याप्त होकर बैठे हैं ॥ १८ ॥ आप चर-अचर सब में व्याप्त हो. आप सर्वसाक्षी और विश्वदृष्टा हो तथा निरंजन निराकार रूप में सब प्राणी आप में ही निवास करते है, हे जगन्नाथ! आप के बिना कुछ भी नहीं है। क्या आप मुझ अभागे के कष्ट को नहीं जानते हैं? ॥ २० ॥ तथापि हे नाथ! मैं अपनी व्यथा को कहता हूँ जिस प्रकार मैं दुःखजाल से घिरा हुआ हूँ वैसे दुःखित को मैंने न कहीं देखा है और न सुना है ॥ २१ ॥

क्षण, निमेष, मुहूर्त, पक्ष, मास, दिन और रात सब अपने-अपने स्वामियों के अधिकारों से सर्वदा बिना भय के प्रसन्न रहते हैं ॥ २२ ॥ मेरा न कुछ नाम है, न मेरा कोई अधिपति है और न कोई मुझको आश्रय है अतः क्षणादिक समस्त स्वामी वाले देवों ने शुभ कार्य से मेरा निरादर किया है ॥ २३ ॥ यह मलमास सर्वदा त्याज्य है, अन्धा है, गर्त में गिरने वाला है ऐसा सब कहते हैं। इसी के कारण से मैं मरने की इ्च्छा करता हूँ अब जीने की इ्च्छा नहीं है ॥ २४ ॥ निन्द्य जीवन से तो मरना ही उत्तम है। जो सदा जला करता है वह किस तरह सो सकता है, हे महाराज! इससे अधिक मुझको और कुछ कहना नहीं है ॥ २५ ॥

वेदों में आपकी इस तरह प्रसिद्धि है कि पुरुषोत्तम आप परोपकार प्रिय हैं और दूसरों के दुःख को सहन नहीं करते हैं ॥ २६ ॥ अब आप अपना धर्म समझकर जैसी इच्छा हो वैसा करें। आप प्रभु और महान् हैं, आपके सामने मुझ जैसे पामर को घड़ी-घड़ी कुछ कहते रहना उचित नहीं है ॥ २७ ॥ मैं मरूँगा, मैं मरूँगा, मैं अब न जीऊँगा, ऐसा पुनः पुनः कहकर वह अधिमास, हे ब्रह्मा के पुत्र! चुप हो गया ॥ २८ ॥

और एकाएक श्रीविष्णु के निकट गिर गया। तब इस प्रकार गिरते हुए मलमास को देख भगवान् की सभा के लोग बड़े विस्मय को प्राप्त हुए ॥ २९ ॥

श्रीनारायण बोले:-

इस प्रकार कहकर चुप हुए अधिमास के प्रति बहुत कृपा-भार से अवसन्न हुए श्रीकृष्ण, मेघ के समान गम्भीर वाणी से चन्द्रमा की किरणों की तरह उसे शान्त करते हुए बोले ॥ ३० ॥

सूतजी बोले:-

हे विप्रो! वेदरूप ऋद्धि के आश्रित नारायण का पापों के समूहरूप समुद्र को शोषण करने वाला बड़वानल अग्नि से समान वचन सुनकर प्रसन्न हुए नारदमुनि, पुनः आदिपुरुष के वचनों को सुनने की इच्छा से बोले ॥ ३१ ॥

इतिश्री बृहन्नारदीय पुराणे पुरुषोत्तममासेअधिकमासे बैकुंठ पदार्पण नाम चतुर्थोऽध्यायः समाप्त

Adhik Maas Katha Adhyay 5, Purushottam Maas Katha Adhyay 5

पुरुषोतम मास माहात्म्य/अधिक मास माहात्म्य अध्याय– 5 (Adhik Maas Adhyay 5, Purushottam Maas Adhyay 5)

पुरुषोतम मास माहात्म्य / अधिक मास माहात्म्य अध्याय – 5


जय श्री राधे कृष्णा ! 

adhik maas mahatmya adhyay 5

मल मास द्वारा अपने मर जाने की प्रार्थना भगवन श्री हरि को करना

देवऋषि नारद जी ने भगवान श्री नारायण से पूछा:-

हे महाभाग ! चरणों में पड़े अधिक मास को भगवान श्री हरि ने क्या उतर दिया और उससे क्या क्या कहा था? वह सम्पूर्ण वृतांत कृपा करके मुझसे विस्तारपूर्वक कहिये .

श्रीनारायण बोले:-

हे पापरहित! हे नारद! जो हरि ने मलमास के प्रति कहा वह हम कहते हैं , सुनो! हे मुनिश्रेष्ठ! आप जो सत्कथा हमसे पूछते हैं आप धन्य हैं

श्रीकृष्ण बोले:-

हे अर्जुन! बैकुण्ठ का वृत्तान्त हम तुम्हारे सम्मुख कहते हैं, सुनो! मलमास के मूर्छित हो जाने पर हरि के नेत्र से संकेत पाये हुए गरुड़ मूर्छित मलमास को पंख से हवा करने लगे। हवा लगने पर अधिमास उठ कर फिर बोला हे स्वामी! मै इस प्रकार का जीवन नहीं चाहता, मै तो आपकी शरण आया हु, मुझे त्यागिये नहीं.. हे जगत्‌ को उत्पन्न करने वाले! हे विष्णो! हे जगत्पते! मेरी रक्षा करो! रक्षा करो! हे नाथ! मुझ शरण आये की आज कैसे उपेक्षा कर रहे हैं ॥ ५ ॥ इस प्रकार कहकर काँपते हुए घड़ी-घड़ी विलाप करते हुए अधिमास, बैकुण्ठ में रहने वाले हृषीकेश हरि, से बोले।

अधिक मास की ये सब बाते सुन कर भगवान हृषीकेश बोले :-

हे पुत्र! उठो-उठो तुम्हारा कल्याण हो, हे वत्स! विषाद मत करो।

ऐसा कहकर प्रभु मन में सोचकर क्षणभर में उपाय निश्चय करके, पुनः अधिमास से बोले ॥ ८ ॥
श्री विष्णु बोले – हे वत्स! योगियों को भी जो दुर्लभ गोलोक है वहाँ मेरे साथ चलो जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम, ईश्वर रहते हैं ॥

गोपियों के समुदाय के मध्य में स्थित, दो भुजा वाले, मुरली को धारण किए हुए नवीन मेघ के समान श्याम, लाल कमल के सदृश नेत्र वाले ॥

शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान अति सुन्दर मुख वाले, करोड़ों कामदेव के लावण्य की मनोहर लीला के धाम ॥

पीताम्बर धारण किये हुए, माला पहिने, वनमाला से विभूषित, उत्तम रत्ना भरण धारण किये हुए, प्रेम के भूषण, भक्तों के ऊपर दया करने वाले ॥ 

चन्दन चर्चित सर्वांग, कस्तूरी और केशर से युक्त, वक्षस्थल में श्रीवत्स चिन्ह से शोभित, कौस्तुक मणि से विराजित ॥ १३ ॥ श्रेष्ठ से श्रेष्ठ रत्नों के सार से रचित किरीट वाले, कुण्डलों से प्रकाशमान, रत्नों के सिंहासन पर बैठे हुए, पार्षदों से घिरे हुए जो हैं ॥ १४ ॥

वही पुराण पुरुषोत्तम परब्रह्म हैं। वे सर्वतन्त्रर स्वतंत्र हैं, ब्रह्माण्ड के बीज, सबके आधार, परे से भी परे ॥

निस्पृह, निर्विकार, परिपूर्णतम, प्रभु, माया से परे, सर्वशक्तिसम्पन्न, गुणरहित, नित्यशरीरी ॥ ऐसे प्रभु जिस गोलोक में रहते हैं वहाँ हम दोनों चलते हैं वहाँ श्रीकृष्णचन्द्र तुम्हारा दुःख दूर करेंगे।

श्रीनारायण बोले :-

ऐसा कहकर अधिमास का हाथ पकड़ कर हरि, गोलोक को गये ॥ १७ ॥
हे मुने! जहाँ पहले के प्रलय के समय में वे अज्ञानरूप महा अन्धकार को दूर करने वाले, ज्ञानरूप मार्ग को दिखाने वाले केवल ज्योतिः स्वरूप थे ॥ १८ ॥ जो ज्योति करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाली, नित्य, असंख्य और विश्व की कारण थी तथा उन स्वेच्छामय विभुकी ही वह अतिरेक की चरम सीमा को प्राप्त थी ॥ १९ ॥ जिस ज्योति के अन्दर ही मनोहर तीन लोक विराजित हैं। हे मुने! उसके ऊपर अविनाशी ब्रह्म की तरह गोलोक विराजित है ॥ २० ॥ तीन करोड़ योजन का चौतरफा जिसका विस्तार है और मण्डलाकार जिसकी आकृति है, लहलहाता हुआ साक्षात् मूर्तिमान तेज का स्वरूप है, जिसकी भूमि रत्नमय है ॥ २१ ॥

योगीजन इसे स्वप्न में भी नहीं देख पाते, केवल वैष्णवजन ही वहाँ पहुच पाते है.. ईश्वकर ने योग द्वारा जिसे धारण कर रखा है ऐसा उत्तम लोक अन्तरिक्ष में स्थित है ॥ २२ ॥

आधि, व्याधि, बुढ़ापा, मृत्यु, शोक, भय आदि से रहित है, श्रेष्ठ रत्नों से भूषित असंख्य मनकों से शोभित है ॥ २३ ॥ उस गोलोक के नीचे पचास करोड़ योजन के विस्तार के भीतर दाहिने बैकुण्ठ और बाँयें उसी के समान मनोहर शिवलोक स्थित है ॥

आधि, व्याधि, बुढ़ापा, मृत्यु, शोक, भय आदि से रहित है, श्रेष्ठ रत्नों से भूषित असंख्य मनकों से शोभित है ॥ २३ ॥ उस गोलोक के नीचे पचास करोड़ योजन के विस्तार के भीतर दाहिने बैकुण्ठ और बाँयें उसी के समान मनोहर शिवलोक स्थित है ॥

बड़े भाग्यवान्‌ शंकर के गण जहाँ निवास करते हैं, शिवलोक में रहने वाले सब लोग सर्वांग भस्म धारण किये, नाग का यज्ञोपवीत पहने हुए ॥ २८ ॥ अर्धचन्द्र जिनके मस्तक में शोभित है, त्रिशूल और पट्टिशधारी, सब गंगा को धारण किये वीर हैं और सबके सब शंकर के समान जयशाली हैं ॥

गोलोक के अन्दर अति सुन्दर एक ज्योति है। वह ज्योति परम आनन्द को देने वाली और परमानन्द का कारण है ॥ ३० ॥ योगी लोग बराबर योग द्वारा ज्ञानचक्षु से आनन्द जनक, निराकार और पर से भी पर उसी ज्योति का ध्यान करते हैं ॥ ३१ ॥ उस ज्योति के अन्दर अत्यन्त सुन्दर एक रूप है जो कि नीलकमल के पत्तों के समान श्याम, लाल कमल के समान नेत्र वाले ॥ ३२ ॥

करोड़ों शरत्पूर्णिमा के चन्द्र के समान शोभायमान मुखवाले, करोड़ों कामदेव के समान सौन्दर्य की, लीला का सुन्दर धाम ॥ ३३ ॥ दो भुजा वाले, मुरली हाथ में लिए, मन्दहास्य युक्त, पीताम्बर धारण किए, श्रीवत्स चिह्न से शोभित वक्षःस्थल वाले, कौस्तुभमणि से सुशोभित ॥ ३४ ॥ करोड़ों उत्तम रत्नों से जटित चमचमाते किरीट और कुण्डलों को धारण किये, रत्न के सिंहासन पर विराजमान्‌, वनमाला से सुशोभित ॥ ३५ ॥

वही श्रीकृष्ण नाम वाले पूर्ण परब्रह्म हैं। अपनी इच्छा से ही संसार को नचाने वाले, सबके मूल कारण, सबके आधार, पर से भी परे ॥ ३६ ॥

छोटी अवस्था वाले, निरन्तर गोपवेष को धारण किये हुए, करोड़ों पूर्ण चन्द्रों की शोभा से संयुक्त, भक्तों के ऊपर दया करने वाले ॥ ३७ ॥

निःस्पृह, विकार रहित, परिपूर्णतम, स्वामी रासमण्डप के बीच में बैठे हुए, शान्त स्वरूप, रास के स्वामी ॥ ३८ ॥ मंगलस्वरूप, मंगल करने के योग्य, समस्त मंगलों के मंगल, परमानन्द के राजा, सत्यरूप, कभी भी नाश न होने वाले विकार रहित ॥ ३९ ॥ समस्त सिद्धों के स्वामी, सम्पूर्ण सिद्धि के स्वरूप, अशेष सिद्धियों के दाता, माया से रहित, ईश्वर, गुणरहित, नित्यशरीरी ॥ ४० ॥ आदिपुरुष, अव्यक्त, अनेक हैं नाम जिनके, अनेकों द्वारा स्तुति किए जाने वाले, नित्य, स्वतन्त्र, अद्वितीय, शान्त स्वरूप, भक्तों को शान्ति देने में परायण ऐसे परमात्मा के स्वरूप को ॥ ४१ ॥ शान्तिप्रिय, शान्त और शान्ति परायण जो विष्णुभक्त हैं वे ध्यान करते हैं। इस प्रकार के स्वरूप वाले भगवान्‌ कहे जाने वाले, वही एक आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र हैं ॥ ४२ ॥

श्रीनारायण बोले :-

ऐसा कहकर सत्त्व स्वरूप भगवान्, विष्णु अधिमास को साथ लेकर शीघ्र ही परब्रह्मयुक्त गोलोक में पहुंचे 

सूतजी बोले:-

ऐसा कहकर सत्क्रिया को ग्रहण किये हुए नारायण मुनि के चुप हो जाने पर आनन्द सागर पुरुषोत्तम से विविध प्रकार की नयी कथाओं को सुनने की इच्छा रखने वाले नारद मुनि उत्कण्ठा पूर्वक बोले ॥ ४४ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे श्रीनारायणनारदसंवादे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये विष्णोर्गोलोकगमने पञ्चमोऽध्यायः संपूर्णम ॥ ५

Adhik Maas Katha Adhyay 6, Purushottam Maas Katha Adhyay 6

पुरुषोतम मास माहात्म्य/अधिक मास माहात्म्य अध्याय– 6 (Adhik Maas Adhyay 6, Purushottam Maas Adhyay 6)

पुरुषोतम मास माहात्म्य / अधिक मास माहात्म्य अध्याय – 6


adhik maas mahatmya adhyay 6

नारदजी बोले– भगवान् गोलोक में जाकर क्या करते हैं ? हे पापरहित! मुझ श्रोता के ऊपर कृपा करके कहिये ॥ १ ॥

श्रीनारायण बोले –

हे नारद! पापरहित! अधिमास को लेकर भगवान् विष्णु के गोलोक जाने पर जो घटना हुई वह हम कहते हैं, सुनो ॥ २ ॥

उस गोलोक के अन्दर मणियों के खम्भों से सुशोभित, सुन्दर पुरुषोत्तम के धाम को दूर से भगवान् विष्णु देखते हुए ॥ ३ ॥
उस धाम के तेज से बन्द हुए नेत्र वाले विष्णु धीरे-धीरे नेत्र खोलकर और अधिमास को अपने पीछे कर धीरे-धीरे धाम की ओर जाने लगे॥ ४ ॥


अधिमास के साथ भगवान् के मन्दिर के पास जाकर विष्णु अत्यन्त प्रसन्न हुए और उठकर खड़े हुए द्वारपालों से अभिनन्दित भगवान् विष्णु पुरुषोत्तम भगवान् की शोभा से आनन्दित होकर धीरे-धीरे मन्दिर में गये और भीतर जाकर शीघ्र ही श्रीपुरुषोत्तम कृष्ण को नमस्कार करते हुए ॥ ५-६ ॥
गोपियों के मण्डल के मध्य में रत्नमय सिंहासन पर बैठे हुए कृष्ण को नमस्कार कर पास में खड़े होकर विष्णु बोले ॥ ७ ॥

श्रीविष्णु बोले –

गुणों से अतीत, गोविन्द, अद्वितीय, अविनाशी, सूक्ष्म, विकार रहित, विग्रहवान, गोपों के वेष के विधायक ॥ ८ ॥

छोटी अवस्था वाले, शान्त स्वरूप, गोपियों के पति, बड़े सुन्दर, नूतन मेघ के समान श्याम, करोड़ों कामदेव के समान सुन्दर ॥ ९ ॥
वृन्दावन के अन्दर रासमण्डल में बैठने वाले पीतरंग के पीताम्बर से शोभित, सौम्य, भौंहों के चढ़ाने पर मस्तक में तीन रेखा पड़ने से सुन्दर आकृति वाले ॥ १० ॥
रासलीला के स्वामी, रासलीला में रहने वाले, रासलीला करने में सदा उत्सुक, दो भुजा वाले, मुरलीधर, पीतवस्त्रधारी, अच्युत ॥ ११ ॥
ऐसे भगवान् की मैं वन्दना करता हूँ। इस प्रकार स्तुति करके भगवान् श्रीकृष्ण को नमस्कार कर, पार्षदों द्वारा सत्कृत विष्णु रत्नसिंहासन पर कृष्ण की आज्ञा से बैठे ॥ १२ ॥

तब श्रीकृष्ण ने विष्णु से पूछा कि यह कौन है? कहाँ से यहाँ आया है? क्यों रोता है? इस गोलोक में तो कोई भी दुःखभागी होता नहीं है ॥ १६ ॥
इस गोलोक में रहने वाले तो सर्वदा आनन्द में मग्न रहते हैं। ये लोग तो स्वप्न में भी दुष्टवार्ता या दुःख भरा समाचार सुनते ही नहीं ॥ १७ ॥

अतः हे विष्णो! यह क्यों काँपता है और आँखों से आँसू बहाता दुःखित हमारे सम्मुख किस लिये खड़ा है? ॥ १८ ॥
सिंहासन से उठकर महाविष्णु मलमास की सम्पूर्ण दुःख-गाथा कहते हुए ॥ १९ ॥

श्रीविष्णु बोले :-

हे वृन्दावन की शोभा के नाथ! हे श्रीकृष्ण! हे मुरलीधर! इस अधिमास के दुःख को आपके सामने कहता हूँ, आप सुने ॥ २० ॥
इसके दुःखित होने के कारण ही स्वामी रहित अधिमास को लेकर मैं आपके पास आया हूँ, इसके उग्र दुःखरूप अग्नि को आप शान्त करें ॥ २१ ॥
यह अधिमास सूर्य की संक्रान्ति से रहित है, मलिन है, शुभकर्म में सर्वदा वर्जित है ॥ २२ ॥
स्वामी रहित मास में स्नान आदि नहीं करना चाहिये, ऐसा कहकर वनस्पति आदिकों ने इसका निरादर किया है ॥ २३ ॥
द्वादश मास, कला, क्षण, अयन, संवत्सर आदि सेश्विरों ने अपने-अपने स्वामी के गर्व से इसका अत्यन्त निरादर किया ॥ २४ ॥
तैयार हुआ, तब अन्य दयालु व्यक्तियों द्वारा प्रेरित होकर ॥ २५ ॥
हे हृषीकेश! शरण चाहने की इच्छा से हमारे पास आया और काँपते-काँपते घड़ी-घड़ी रोते-रोते अपना सब दुःखजाल इसने कहा ॥ २६ ॥
इसका यह बड़ा भारी दुःख आपके बिना टल नहीं सकता, अतः इस निराश्रय का हाथ पकड़कर आपकी शरण में लाया हूँ ॥ २७ ॥
‘दूसरों का दुःख आप सहन नहीं कर सकते हैं’ ऐसा वेद जानने वाले लोग कहते हैं। अतएव इस दुःखित को कृपा करके सुख प्रदान कीजिये ॥ २८ ॥
हे जगत्पते! ‘आपके चरणकमलों में प्राप्त प्राणी शोक का भागी नहीं होता है’ ऐसा वेद जाननेवालों का कहना कैसे मिथ्या हो सकता है? ॥ २९ ॥
मेरे ऊपर कृपा करके भी इसका दुःख दूर करना आपका कर्तव्य है क्योंकि सब काम छोड़कर इसको लेकर मैं आया हूँ मेरा आना सफल कीजिये ॥ ३० ॥

‘बारम्बार स्वामी के सामने कभी भी कोई विषय न कहना चाहिये’ ऐसी नीति के जानने वाले बड़े- बड़े पण्डित सर्वदा कहा करते हैं ॥ ३१ ॥
इस प्रकार अधिमास का सब दुःख भगवान् कृष्ण से कहकर हरि, कृष्ण के मुखकमल की ओर देखते हुए कृष्ण के पास ही हाथ जोड़ कर खड़े हो गये ॥ ३२ 

ऋषि लोग बोले –

हे सूतजी! आप दाताओं में श्रेष्ठ हैं आपकी दीर्घायु हो, जिससे हम लोग आपके मुख से भगवान् की लीला के कथारूप अमृत का पान करते रहें ॥ ३३ ॥
हे सूत! गोलोकवासी भगवान् कृष्ण ने विष्णु के प्रति फिर क्या कहा? और क्या किया? इत्यादि लोकोपकारक विष्णु-कृष्ण का संवाद सब आप हम लोगों से कहिये ॥ ३४ ॥
परम भगवद्भक्त नारद ने नारायण से क्या पूछा? हे सूत! इसको आप इस समय हम लोगों से कहिये। नारद के प्रति कहा हुआ भगवान्‌ का वचन तपस्वियों के लिये परम औषध है ॥ ३५ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे पुरुषोत्तमविज्ञप्तिर्नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

Adhik Maas Katha Adhyay 7, Purushottam Maas Katha Adhyay 7

पुरुषोतम मास माहात्म्य/अधिक मास माहात्म्य अध्याय– 7 (Adhik Maas Adhyay 7, Purushottam Maas Adhyay 7)

पुरुषोतम मास माहात्म्य / अधिक मास माहात्म्य अध्याय – 7


adhik maas mahatmya adhyay 7

सूतजी बोले:-

हे तपोधन! आप लोगों ने जो प्रश्न किया है वही प्रश्न नारद ने नारायण से किया था सो नारायण ने जो उत्तर दिया वही हम आप लोगों से कहते हैं ॥ १ ॥

नारदजी बोले:-

विष्णु ने अधिमास का अपार दुःख निवेदन करके जब मौन धारण किया तब हे बदरीपते! पुरुषोत्तम ने क्या किया? सो इस समय आप हमसे कहिये ॥ २ ॥

श्रीनारायण बोले :-

 हे वत्स! गोलोकनाथ श्रीकृष्ण ने विष्णु के प्रति जो कहा वह अत्यन्त गुप्त है परन्तु भक्त, आस्तिक, सेवक, दम्भरहित, अधिकारी पुरुष को कहना चाहिये। अतः मैं सब कहता हूँ सुनो ॥ ३ ॥

यह आख्यान सत्कीर्ति, पुण्य, यश, सुपुत्र का दाता, राजा को वश में करने वाला है और दरिद्रता को नाश करने वाला एवं बड़े पुण्यों से सुनने को मिलता है। जिस प्रकार इसको सुने उसी प्रकार अनन्य भक्ति से सुने हुए कर्मों को करना भी चाहिये ॥ ४ ॥

श्रीपुरुषोत्तम बोले :-

हे विष्णो! आपने बड़ा अच्छा किया जो मलमास को लेकर यहाँ आये। इससे आप लोक में कीर्ति पावेंगे ॥ ५ ॥
आपने जिसका उद्धार स्वीकार किया, उसको हमने ही स्वीकार किया, ऐसा समझें। अतः इसको हम अपने समान सर्वोपरि करेंगे ॥ ६ ॥
गुणों से, कीर्ति के अनुभाव से, षडैश्वयर्य से, पराक्रम से, भक्तों को वर देने से और भी जो मेरे गुण हैं, उनसे मैं पुरुषोत्तम जैसे लोक में प्रसिद्ध हूँ। वैसे ही यह मलमास भी लोकों में पुरुषोत्तम करके प्रसिद्ध होगा ॥ ७-८ ॥
मेरे में जितने गुण हैं वे सब आज से मैंने इसे दे दिये। पुरुषोत्तम जो मेरा नाम लोक तथा वेद में प्रसिद्ध है ॥ ९ ॥
वह भी आपकी प्रसन्नता का अर्थ आज मैंने इसे दे दिया। हे मधुसूदन! आज से मैं इस अधिमास का स्वामी भी हुआ ॥ १० ॥
इसके पुरुषोत्तम इस नाम से सब जगत् पवित्र होगा। मेरी समानता पाकर यह अधिमास सब मासों का राजा होगा ॥ ११ ॥
यह अधिमास जगत्पूज्य एवं जगत् से वन्दना करवाने के योग्य होगा। इसकी पूजा और व्रत जो करेंगे उनके दुःख और दारिद्रय का नाश होगा ॥ १२ ॥
चैत्रादि सब मास सकाम हैं इसको हमने निष्काम किया है। इसको हमने अपने समान समस्त प्राणियों को मोक्ष देने वाला बनाया है ॥ १३ ॥
जो प्राणी सकाम अथवा निष्काम होकर अधिमास का पूजन करेगा वह अपने सब कर्मों को भस्म कर निश्चय मुझको प्राप्त होगा ॥ १४ ॥
जिस परम पद-प्राप्ति के लिये बड़े भाग्यवाले, यति, ब्रह्मचारी लोग तप करते हैं और महात्मा लोग निराहार व्रत करते हैं एवं दृढ़व्रत लोग फल, पत्ता, वायु-भक्षण कर रहते हैं और काम, क्रोध रहित जितेन्द्रिय रहते हैं वे, और वर्षाकाल में मैदान में रहने वाले, जाड़े में शीत, गरमी में धूप सहन करने वाले – मेरे पद के लिये यत्नद करते रहते हैं, हे गरुडध्वज! तब भी वे मेरे अव्यय परम पद को नहीं प्राप्त होते हैं ॥ १५-१६-१७ ॥
परन्तु पुरुषोत्तम के भक्त एक मास के ही व्रत से बिना परिश्रम जरा, मृत्यु रहित उस परम पद को पाते हैं ॥ १८ ॥
यह अधिमास व्रत सम्पूर्ण साधनों में श्रेष्ठ साधन है और समस्त कामनाओं के फल की सिद्धि को देने वाला है। अतः इस पुरुषोत्तम मास का व्रत सबको करना चाहिये ॥ १९ ॥
हल से खेत में बोये हुए बीज जैसे करोड़ों गुणा बढ़ते हैं तैसे मेरे पुरुषोत्तम मास में किया हुआ पुण्य करोड़ों गुणा अधिक होता है ॥ २० ॥
कोई चातुर्मास्यादि यज्ञ करने से स्वर्ग में जाते हैं, वह भी भोगों को भोगकर पृथ्वी पर आते हैं ॥ २१ ॥
परन्तु जो पुरुष आदर से विधिपूर्वक अधिमास का व्रत करता है वह अपने समस्त कुल का उद्धार कर मेरे में मिल जाता है इसमें संशय नहीं है ॥ २२ ॥
हमको प्राप्त होकर प्राणी पुनः जन्म, मृत्यु, भय से युक्त एवं आधि, व्याधि और जरा से ग्रस्त संसार में फिर नहीं आता ॥ २३ ॥
जहाँ जाकर फिर पतन नहीं होता सो मेरा परम धाम है, ऐसा जो वेदों का वचन है वह सत्य है, असत्य कैसे हो सकता है? ॥ २४ ॥
यह अधिमास और इसका स्वामी मैं ही हूँ और मैंने ही इसे बनाया है और ‘पुरुषोत्तम’ यह जो मेरा नाम है सो भी मैंने इसे दे दिया है ॥ २५ ॥
अतः इसके भक्तों की मुझे दिन-रात चिन्ता बनी रहती है। उसके भक्तों की मनःकामनाओं को मुझे ही पूर्ण करना पड़ता है ॥ २६ ॥
कभी-कभी मेरे भक्तों का अपराध भी गणना में आ जाता है, परन्तु पुरुषोत्तम मास के भक्तों का अपराध मैं कभी नहीं गिनता ॥ २७ ॥
हे विष्णो! मेरी आराधना से मेरे भक्तों की आराधना करना मुझे प्रिय है। मेरे भक्तों की कामना पूर्ण करने में मुझे कभी देर भी हो जाती है ॥ २८ ॥
किन्तु मेरे मास के जो भक्त हैं उनकी कामना पूर्ण करने में मुझे कभी भी विलम्ब नहीं होता है। मेरे मास के जो भक्त हैं वे मेरे अत्यन्त प्रिय हैं ॥ २९ ॥
जो मनुष्य इस अधिमास में जप, दान नहीं करते वे महामूर्ख हैं और जो पुण्य कर्मरहित प्राणी स्नान भी नहीं करते एवं देवता, तीर्थ द्विजों से द्वेष करते हैं ॥ ३० ॥
वे दुष्ट अभागी और दूसरे के भाग्य से जीवन चलने वाले होते हैं। जिस प्रकार खरगोश के सींग कदापि नहीं होते वैसे ही अधिमास में स्नानादि न करने वालों को स्वप्न में भी सुख प्राप्त नहीं होता है ॥ ३१ ॥
जो मूर्ख मेरे प्रिय मलमास का निरादर करते हैं और मलमास में धर्माचरण नहीं करते वे सर्वदा नरकगामी होते हैं ॥ ३२ ॥
प्रति तीसरे वर्ष पुरुषोत्तम मास प्राप्त होने पर जो प्राणी धर्म नहीं करते वे कुम्भीपाक नरक में गिरते हैं ॥ ३३ ॥
और इस लोक में दुःख रूप अग्नि में बैठे स्त्री, पुत्र, पौत्र आदिकों से उत्पन्न बड़े भारी दुःखों को भोगते हैं ॥ ३४ ॥
जिन प्राणियों को यह मेरा पुण्यतम पुरुषोत्तम मास अज्ञान से व्यतीत हो जाय वे प्राणी कैसे सुखों को भोग सकते हैं? ॥ ३५ ॥
जो भाग्यशालिनी स्त्रियाँ सौभाग्य और पुत्र-सुख चाहने की इच्छा से अधिमास में स्नान, दान, पूजनादि करती हैं ॥ ३६ ॥
उन्हें सौभाग्य, सम्पूर्ण सम्पत्ति और पुत्रादि यह अधिमास देत है। जिनका यह मेरे नामवाला पुरुषोत्तम मास दानादि से रहित बीत जाता है ॥ ३७ ॥
उनके अनुकूल मैं नहीं रहता और न उन्हें पति-सुख प्राप्त होता है, भाई, पुत्र, धनों का सुख तो उसे स्वप्न में भी दुर्लभ है ॥ ३८ ॥
अतः विशेष करके सब प्राणियों को अधिमास में स्नान, पूजा, जप आदि और विशेष करके शक्ति के अनुसार दान अवश्य कर्तव्य है ॥ ३९ ॥
जो मनुष्य इस पुरुषोत्तम मास में भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करते हैं वे धन, पुत्र और अनेक सुखों को भोगकर पुनः गोलोक के वासी होते हैं ॥ ४० ॥
मेरी आज्ञा से सब जन मेरे अधिमास का पूजन करेंगे। मैंने सब मासों से उत्तम मास इसे बनाया है ॥ ४१
इसलिये अधिमास की चिन्ता त्याग कर हे रमापते! आप इस अतुलनीय पुरुषोत्तम मास को साथ सेकर अपने बैकुण्ठ में जाओ ॥ ४२ ॥

श्रीनारायण बोले – 

इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से रसिक वचन श्रवण कर विष्णु, अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक इस मलमास को अपने साथ लेकर, नूतन जलधर के समान श्याम भगवान् श्रीकृष्ण को प्रणाम कर, गरुड़ पर सवार हो शीघ्र बैकुण्ठ के प्रति चल दिये ॥ ४३ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादेऽधिमासस्यैश्वर्यप्राप्तिर्नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

Adhik Maas Katha Adhyay 8, Purushottam Maas Katha Adhyay 8

पुरुषोतम मास माहात्म्य/अधिक मास माहात्म्य अध्याय– 8 (Adhik Maas Adhyay 8, Purushottam Maas Adhyay 8)

पुरुषोतम मास माहात्म्य / अधिक मास माहात्म्य अध्याय – 8


adhik maas mahatmya adhyay 8

सूतजी बोले 

हे तपोधन! विष्णु और श्रीकृष्ण के संवाद को सुन सन्तुष्टमन नारद, नारायण से पुनः प्रश्न करने लगे ॥ १ ॥ adhik mas

नारदजी बोले:-

हे प्रभो! जब विष्णु बैकुण्ठ चले गये तब फिर क्या हुआ? कहिये। आदिपुरुष कृष्ण और हरिसुत का जो संवाद है वह सब प्राणियों को कल्याणकर है ॥ २ ॥

इस प्रकार प्रश्न को सुन फिर भगवान् बदरीनारायण जगत् को आनन्द देने वाला बृहत् आख्यान कहने लगे ॥ ३ ॥

श्रीनारायण बोले :-

तदनन्तर विष्णु बड़े प्रसन्न होकर बैकुण्ठ गये और वहाँ जाकर हे नारद! अधिमास को अपने पास ही बसा लिया ॥ ४ ॥

अधिमास बैकुण्ठ में वास पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ और बारहों मासों का राजा होकर विष्णु के साथ रहने लगा ॥ ५ ॥
बारहों मासों में मलमास को श्रेष्ठ बनाकर विष्णु मन से सन्तुष्ट हुए ॥ ६ ॥
हे मुने! अनन्तर भक्तों के ऊपर कृपा करने वाले भगवान् युधिष्ठिर और द्रौपदी की ओर देखते हुए, कृपा करके अर्जुन से यह बोले ॥ ७ ॥

श्रीकृष्ण बोले :-

हे राजशार्दूल! हमको मालूम होता है कि तपोवन में आकर आप लोगों ने दुःखित होने के कारण पुरुषोत्तम मास का आदर नहीं किया ॥ ८ ॥
वृन्दावन की शोभा के नाथ भगवान् का प्रियपात्र पुरुषोत्तम मास आप वनवासियों का प्रमाद से व्यतीत हो गया ॥ ९ ॥
भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण के भय से सन्त्रस्त मन आप सब लोगों ने भय और द्वेष से मुक्त होने के कारण प्राप्त पुरुषोत्तम मास का ध्यान नहीं किया ॥ १० ॥
कृष्णद्वैपायन व्यासदेव से प्राप्त विद्या के आराधन में तत्पर, रणवीर अर्जुन के इन्द्रकील पर्वत पर चले जाने पर ॥ ११ ॥
उसके वियोग से दुःखित आप लोगों ने पुरुषोत्तम मास को नहीं जाना। अब यदि आप यह पूछें कि हम क्या करें? तो मैं यही कहूँगा कि भाग्य का अवलम्बन करो ॥ १२ ॥
पुरुषों का जैसा अदृष्ट होता है वैसा ही सदा भासता है। भाग्य से उत्पन्न जो फल है वह अवश्य ही भोगना पड़ता है ॥ १३ ॥
सुख, दुःख भय, कुशलता इत्यादि भाग्यानुसार ही मनुष्यों को प्राप्त होते हैं। अतः अदृष्ट पर विश्वास रखने वाले आप लोगों को अदृष्ट पर निर्भर रहना चाहिये ॥ १४ ॥
अब इसके बाद आप लोगों के दुःख का दूसरा कारण और बड़ा आश्चर्यजनक इतिहास के सहित कहते हैं – हे महाराज! हमारे मुख से कहा हुआ सुनो ॥ १५ ॥

श्रीकृष्ण बोले 

यह भाग्यशालिनी द्रौपदी पूर्व जन्म में बड़ी सुन्दरी मेधावी ऋषि के घर में उत्पन्न हुई थी। समय व्यतीत होने पर जब दस वर्ष की हुई तब क्रम से रूप और लावण्य से युक्त, अति सुंदर और  आकर्षक नेत्र से शोभायमान हुई ॥ १६-१७ ॥
चातुर्य गुण से युक्त यह अपने पिता की एकमात्र इकलौती कन्या थी। अतः चतुरा, गुणवती, सुन्दरी, यह पिता की बड़ी लाड़ली थी ॥ १८ ॥
मेधावी ने सदा लड़के की तरह इसे माना, कभी भी अनादर नहीं किया। यह भी साहित्यशास्त्र में पण्डिता और नीतिशास्त्र में भी प्रवीणा थी ॥ १९ ॥
इसकी माता इसकी छोटी अवस्था में ही मर गई थी, पिता ने ही प्रसन्नतापूर्वक पाला-पोसा था। पास में रहने वाली अपनी सखी के पुत्र-पौत्रादि सुख को देख इसको भी स्पृहा हुई ॥ २० ॥
और तब यह सोचने लगी कि हमें भी यह सुख कैसे प्राप्त होगा? गुण और भाग्य का निधि, सुख देने वाला पति और सत्पुत्र कैसे होंगे? ॥ २१ ॥
इस प्रकार मनोरथ विचारती हुई सोचने लगी कि पहिले मेरा विवाह उपस्थित था, परन्तु भाग्य ने बिगाड़ दिया। अब क्या करने से अथवा क्या जानने से एवं किस देवता की उपासना करने से ॥ २२ ॥
या किस मुनि के शरण जाने से अथवा किस तीर्थ का आश्रय करने से मेरी मनःकामना पूर्ण होगी। मेरा भाग्य कैसा सो गया कि कोई भी पति मुझको वरण नहीं करता है ॥ २३ ॥
पण्डित भी मेरा पिता मेरे ही दुर्भाग्य से मूर्ख हो गया है, बड़ा आश्चर्य है! विवाह का समय उपस्थित होने पर भी मेरे समान वर को पिता ने नहीं दिया ॥ २४ ॥
मैं अपनी सहेलियों के बीच में प्रमुख हूँ, परन्तु कुमारी होने के कारण पति दुःख से पीड़ित हूँ। जैसे मेरी सखियाँ पति-सुख को भोगनेवाली हैं वैसे मैं नहीं हूँ ॥ २५ ॥
मेरी भाग्यवती माता क्यों पहिले मर गयी? इस प्रकार चिन्ता से व्याकुल कन्या, मनोरथ रूप समुद्र के ॥ २६ ॥
मोहरूप जल में निमग्न हो शोकमोहरूप लहरों से पीड़ित हो गई। इसके पिता मेधावी ऋषि भी ॥ २७ ॥
कन्यादान के लिये कन्या के समान वर ढूँढ़ने के हेतु देश-विदेश भ्रमण करने के लिये निकले, परन्तु कन्या के अनुरूप वर न मिलने से अपने मनोरथ में निराश हुए ॥ २८ ॥
कन्या के और अपने भाग्य से कन्या-दानरूप संकल्प के पूर्ण न होने से, दैवयोग के कारण बड़ा भारी दारुण ज्वर उन्हें आगया ॥ २९ ॥
सब अंग ऐसे फूटने लगे जैसे समस्त अंग टूट-टूट कर अलग हो जायँगे और ज्वर की ज्वाला से व्याकुल हुए श्वासोच्छ्वास लेते महादारुण मूर्च्छा से ॥ ३० ॥
मदिरा पान से उन्मत्त की तरह पैर लड़खड़ाते गिरते-पड़ते किसी तरह घर में आये और आते ही पृथ्वी पर गिर पड़े ॥ ३१ ॥
भय से विह्वल कन्या जब तक पिता को देखने आवे तब तक कन्या को स्मरण करते हुए मेधावी मुनि मरणासन्न हो गये। भाग्य के फलरूप बल से एकाएक काँपने लगे और कन्या-दान प्रसंग से उठा हुआ जो महोत्सव था वह जाता रहा ॥ ३२-३३ ॥
तदनन्तर पहिले किये हुए गृहस्थाश्रम धर्म के परिश्रम के प्रभाव से संसारवासना को त्याग कर भगवान् में चित्त को लगाते भए ॥ ३४ ॥
उस मुमूर्षु मेधावी ऋषि ने शीघ्र ही नीलकमल के समान श्याम, त्रिवलिसे सुन्दर आकृति वाले श्रीपुरुषोत्तम हरि का स्मरण किया ॥ ३५ ॥

हे रास के स्वामी! हे राधारमण! हे प्रचण्ड भुजदण्ड से दूर से ही देवताओं के शत्रु दैत्य को मारने वाले! हे अति उग्र दावानल को पान कर जाने वाले! हे कुमारी गोपिकाओं के उतारे हुए वस्त्रों को हरण करने वाले! ॥ ३६ ॥

हे श्रीकृष्ण! हे गोविन्द! हे हरे! हे मुरारे! हे राधेश! हे दामोदर! हे दीनानाथ! मुझ संसार में निमग्न की रक्षा कीजिये। इन्द्रियों के ईश्वार आपको प्रणाम है ॥ ३७ ॥
इस प्रकार मेधावी के वचनों को दूर से ही सुन कर श्रीभगवान् के दूत चट-पट मुकुन्द लोक से आते हुए और उस मरे हुए मुनि को हाथ से पकड़ कर ईश्व र के चरणकमलों में ले आये ॥ ३८ ॥
इस प्रकार अपने पिता के प्राणों को निकलता देख वह कन्या हाहाकार करके रोने लगी और पिता के शरीर को अपनी गोद में रखकर अति दुःख से विलाप करने लगी ॥ ३९ ॥
चील्ह पक्षी की तरह बहुत देर तक विलाप करके अत्यन्त दुःख से विह्नल हुई और पिता को जीवित की तरह समझ कर बोली ॥ ४० ॥

बाला बोली:-

हाय-हाय हे पिता! हे कृपासिन्धो! हे अपनी कन्या को सुख देने वाले! मुझे आज किसके पास छोड़ कर आप बैकुण्ठ सिधारे हैं? ॥ ४१ ॥
हे तात! पितृहीन मेरी कौन रक्षा करेगा? आज मेरे भाई, बन्धु, माता आदि कोई भी नहीं है। हे तात! मेरे भोजन, वस्त्र की चिन्ता कौन करेगा? कैसे मैं रहूँगी, इस शून्य, वेद-ध्वनि-रहित ॥ ४२-४३ ॥
निर्जन वन की तरह आपके घर में। हे मुनिश्रेष्ठ! अब मैं मर जाऊँगी ऐसे जीने में क्या रक्खा है? ॥ ४४ ॥
हे कन्या में प्रेम रखने वाले पिता! हे तात! विवाहविधि बिना किए ही आप कहाँ चले गये? हे तपोनिधे! अब यहाँ आइये ॥ ४५ ॥
और अमृत के समान मधुर भाषण कीजिए। क्यों आप चुप हो गये! हे तात! बहुत देर से आप सोये हुए हैं अब जागिये ॥ ४६ ॥
ऐसा कहकर आँसू बहाती हुई घड़ी-घड़ी कन्या विलाप करने लगी और पिता के मरने से दुःखित हुई आर्ता, चील्ह पक्षी की तरह मुक्तकण्ठ से रोने लगी ॥ ४७ ॥
उस लड़की का रोदन सुन उस वन में रहने वाले ब्राह्मण आपस में कहने लगे कि इस तपोवन में अत्यन्त करुण शब्द से कौन रो रहा है? ॥ ४८ ॥
ऐसा कहकर सब तपस्वी चुप होकर ‘यह मेधावी ऋषि की कन्या का शब्द है’ ऐसा निश्चय कर घबड़ाये हुए हाहाकार करते मेधावी के घर में आये ॥ ४९ ॥
और वहाँ आकर सबने कन्या के गोद में मरे हुए मेधावी ऋषि को देखा और देख कर उस वन के रहने वाले सब मुनि भी रोने लगे ॥ ५० ॥
और कन्या की गोद से शव को लेकर शिव मन्दिर के पास श्मशान पर गये। वहाँ काष्ठ की चिता लगाकर विधि से अन्त्येष्टि कर्मकर उसका दाह किये ॥ ५१ ॥
दाह के अनन्तर कन्या को समझा कर सब ऋषि अपने-अपने आश्रम गये। इधर कन्या भी धैर्य धारण कर यथाशक्ति क्रिया के लिए द्रव्य खर्च करती हुई ॥ ५२ ॥
इस प्रकार पिता की मरण-क्रिया को करके कन्या इसी तपोवन में निवास करने लगी और पिता के मरणरूप दुःखाग्नि से जली हुई रम्भा की तरह व्यथित होती हुई एवं बछड़े के मर जाने से जैसे गौ चिल्लाती है और खाती नहीं दुर्बल होती है वैसे ही यह बाला भी दुःखित हुई ॥ ५३ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे कुमारीविलापो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

Adhik Maas Katha Adhyay 9, Purushottam Maas Katha Adhyay 9

पुरुषोतम मास माहात्म्य/अधिक मास माहात्म्य अध्याय– 9 (Adhik Maas Adhyay 9, Purushottam Maas Adhyay 9)

पुरुषोतम मास माहात्म्य / अधिक मास माहात्म्य अध्याय – 9


adhik maas mahatmya adhyay 9

सूतजी बोले:-

तदनन्तर विस्मय से युक्त नारद मुनि ने मेधावी ऋषि की कन्या का अद्‌भुत वृत्तान्त पूछा ॥ १ ॥

नारदजी बोले:-

 हे मुने! उस तपोवन में मेधावी की कन्या ने बाद में क्या किया? और किस मुनिश्रेष्ठ ने उसके साथ विवाह किया? ॥ २ ॥

श्रीनारायण बोले :-

अपने पिता को स्मरण करते-करते और बराबर शोक करते-करते उस घर में कुछ काल उस कन्या का व्यतीत हुआ ॥ ३ ॥

सिंह से भागती हिरणी की तरह घबड़ाई हुई, सुने घर में रहनेवाली, दुःखरूप अग्नि से उठी हुई भाप द्वारा बहते हुए अश्रुनेत्र वाली, जलते हुए हृत्‍कमल वाली, दुःख से प्रतिक्षण गरम श्‍वास लेनेवाली, अतिदीना, घिरी हुई सर्पिणी की तरह अपने घर में संरुद्ध, अपने दुःख को सोचती और दुःख से मुक्त होने के उपाय को न देखती हुई।

उस कृशोदरी को उसके शुभ भविष्य की प्रेरणा से सान्‍त्वना देने के लिए उस वन में अपनी इच्छा से ही परक्रोधी – जिनको देखने से ही इन्द्र भयभीत होते हैं – ऐसे, जटा से व्याप्त, साक्षात्‌ शंकर के समान भगवान्‌ दुर्वासा ऋषि आये….

हे नारद! भगवान्‌ कृष्ण ने राजा युधिष्ठिर से कहा कि हे राजेन्द्र! वह दुर्वासा ऋषि वही है जिनको आपकी माता कुन्ती ने बालापन में प्रसन्न किया था। तब उन सुपूजित महर्षि ने देवताओं को आकर्षण करने वाली विद्या माता कुंती को दी थी और हे भूपाल! एक बार रुक्मणि के साथ जाते समय मैंने उन्हें रथ में बिठा लिया था… मार्ग में दोनों को प्यास ने सताया.. रुक्मणि ने अपने सूखे अधरों और तालू को दिखाकर मुझे जल लाने को कहाँ… 

मै जल के हेतु पदाघात करता हुआ चला और रुक्मिणी के प्रेम के वशीभूत मैंने भोगवती नाम की नदी को उत्पन्न किया। तब वही भोगवती ऊपर से बहने लगी। अनन्तर उसी के जल से रुक्मिणी की प्यास को मैंने बुझाया। इस प्रकार रुक्मिणी की प्यास का बुझना देख उसी क्षण अग्नि की तरह ऋषि दुर्वासा क्रोध से जलने लगे.. और प्रलय की अग्नि के समान उठकर ऋषि दुर्वासा ने मुझे शाप दिया।

और बोले – बड़ा आश्‍चर्य है, हे श्रीकृष्ण! रुक्मिणी तुमको सदा अत्यन्त प्रिय है.. अतः स्त्री के प्रेम से युक्त तुमने मेरी अवज्ञा कर अपना महत्व दिखलाते हुए, रुक्मणि को इस प्रकार पानी पिलाया.. अतः तुम दोनों का वियोग होगा, इस प्रकार उन्होंने शाप दिया था। हे युधिष्ठिर! वही यह दुर्वासा मुनि हैं…

साक्षात्‌ रुद्र के अंश से उत्पन्न, दूसरे कालरुद्र की तरह, महर्षि अत्रि के उग्र तपरूप कल्पवृक्ष के दिव्य फल… पतिव्रताओं के सिर के रत्‍न, अनुसूया भगवती के गर्भ से उत्पन्न, अत्यन्त मेधायुक्त दुर्वासा नाम के ऋषि… अनेक तीर्थों के जल से भींगी हुई जटा से भूषित सिर वाले, साक्षात्‌ तपोमूर्ति दुर्वासा ऋषि को आते देखकर उस ब्राह्मण कन्या ने शोकसागर से निकल कर धैर्य से मुनि के चरणों में प्रार्थना की।

प्रार्थना करने के बाद–

प्रार्थना करने के बाद जैसे बाल्मीकि ऋषि को जानकी अपने आश्रम में लाई थीं वैसे ही वह कन्या भी ऋषि दुर्वासा को अपने घर में लाकर अर्ध्य, पाद्य और विविध प्रकार के जंगली फलों और पुष्पों से आतिथ्य करके वह कन्या विनय करती हुई बोली -– हे महाभाग! हे अत्रि कुल के सूर्य! आपको प्रणाम है। हे साधो! मुझ अभाग्या के घर में आज आपका शुभागमन कैसे हुआ? हे मुने! आपके आगमन से आज मेरा भाग्योदय हुआ है… अथवा मेरे पिता के पुण्य के प्रवाह से प्रेरित, आप मुझे सान्त्वना देने के लिये ही मुनिसत्तम आये हैं… आप जैसे महात्माओं के पाँव की धूल जो है वह तीर्थरूप है उस धूल का स्पर्श करने वाली मैं अपना जन्म आज सफल कर सकी हूँ, आज मेरे सभी व्रत भी सफल हुए… आप जैसे पुण्यात्मा के जो मुझे आज दर्शन हुए। अतः आज मेरा उत्पन्न होना और मेरे सभी पुण्य सफल है… ऐसा कहकर वह कन्या दुर्वासा के सामने चुपचाप खड़ी हो गयी।

तब भगवान्‌ शंकर के अंश से उत्पन्न दुर्वासा मुनि मन्द, आतिथ्य से संतुष्ट और प्रसन्न होकर बोले:-

 हे पुत्री! तू बड़ी अच्छी है तूने अपने पिता के कुल को तार दिया। यह मेधावी ऋषि के तप का फल है, जो उन्हें तेरे जैसी कन्या उत्पन्न हुई… तेरी धर्म में तत्परता जान, कैलास से, मैं यहाँ आया और तेरे घर आकर तेरे द्वारा मेरा पूजन हुआ… हे वरारोहे! मैं शीघ्र ही बदरिकाश्रम में मुनीश्‍वर सनातन, नारायण, देव के दर्शन के लिये जाऊँगा जो प्राणियों के हित के लिए अत्यन्त उग्र तप कर रहे हैं।

महर्षि दुर्वासा को संतुष्ट एवम प्रसन्न देखकर ब्राह्मण कन्या बोली – हे ऋषिराज! आपके दर्शन पाकर मेरा शोकसमुद्र सूख गया… अब इसके बाद मेरा भविष्य उज्ज्वल है; क्योंकि आपने मुझे सान्‍त्वना दी…

हे मुने! मेरी बड़ी भारी ज्वाला युक्त दुःख रूप अग्नि को क्या आप नहीं जानते हैं? हे दयासिन्धो! हे शंकर! उस दुःखाग्नि को शान्त कीजिये। मेरे विचार से हर्ष का कोई भी कारण मुझे दिखलाई नहीं देता

न मेरी माता है, न पिता, न ही भाई है, जो मुझे धैर्य प्रदान करते, अतः दुःख समुद्र से पीड़ित मैं कैसे जीवित रह सकती हूँ?…. जिस-जिस दिशा में मैं देखती हूँ वह-वह दिशा मुझे शून्य ही प्रतीत होती है, इसलिये हे तपोनिधे! मेरे दुःखका निस्तार आप शीघ्र करें… मेरे साथ विवाह करने के लिए कोई भी तैयार नहीं होता, इस समय मेरा विवाह न हुआ तो मैं शूद्रा हो जाऊँगी.. इसी भय से न मुझे निद्रा आती है और न भोजन में मेरी रुचि होती है…

हे ब्रह्मन्‌! अब तो मुझे मृत्यु के अतिरिक्त ओर कोई मार्ग नहीं सूझता… ऐसा कहकर आँसू बहाती हुई वह कन्या, ऋषि दुर्वासा के सामने चुप हो गयी…

तब ऋषि दुर्वासा कन्या का दुःख दूर करने का उपाय सोचने  लगे… 

श्रीनारायण बोले:-

इस प्रकार मुनि कन्या के वचन सुनकर और इसका अभिप्राय समझ कर बड़े क्रोधी मुनिराज दुर्वासा ने उस कन्या का कुछ हित विचार पूर्ण कृपा से उसे देखकर सारभूत उपाय बतलाया…

॥ इति श्री बृहन्नारदीये पुरुषोत्तम मास माहात्म्ये दुर्वासस्त आगमन नाम नवमोऽध्यायः संपूर्णम ॥

Adhik Maas Katha Adhyay 10, Purushottam Maas Katha Adhyay 10

पुरुषोतम मास माहात्म्य/अधिक मास माहात्म्य अध्याय– 10 (Adhik Maas Adhyay 10, Purushottam Maas Adhyay 10)

पुरुषोतम मास माहात्म्य / अधिक मास माहात्म्य अध्याय – 10


adhik maas mahatmya adhyay 10

नारद जी बोले:-

‘हे तपोनिधे! परम क्रोधीदुर्वासा मुनि ने विचार करके उस कन्या से क्या उपदेश दिया। सो आप मुझसे कहिये।

सूतजी बोले:-

हे द्विजों! नारद का वचन सुनकर, समस्त प्राणियों का हितकर दुर्वासा का गुह्य वचन बदरीनारायण बोले।


श्रीनारायण बोले:-

हे नारद! मेघावी ऋषि की कन्या के दुख को दूर करने के लिये दुर्वासा ऋषि ने जो कहा वह सुनो।

दुर्वासा ऋषि बोले,:-

हे सुन्दरि! गुप्त से भी गुप्त उपाय मैं तुझसे कहता हूँ। यह विषय किसी से भी कहने योग्य नहीं है, तथापि तेरे लिये तो मैंने ये विचार ही लिया है। मैं विस्तार पूर्वक न कहकर तुझसे संक्षेप में कहता हूँ। हे सुभगे! इस मास से तीसरा मास जो आवेगा वह पुरुषोत्तम मास है। इस मास में तीर्थ में स्नान कर मनुष्य भ्रूणहत्या से छूट जाता है। हे सुन्दरि! कार्तिक आदि बारह मासों में इस पुरुषोत्तम मास के बराबर कोई मास नहीं है। जितने मास तथा पक्ष और पर्व हैं वे सब पुरुषोत्तम मास की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं। वेदोक्त साधन और जो परमपद प्राप्ति के साधन हैं वे भी इस मास की सोलहवीं कला के बराबर नहीं हैं। बारह हजार वर्ष गंगा स्नान करने से जो फल मिलता है और सिंहस्थ गुरु में गोदावरी पर एक बार स्नान करने से जो फल मिलता है, हे सुन्दरि! वही फल पुरुषोत्तम मास में किसी भी तीर्थ पर एक बार स्नान करने मात्र से मिल जाता है। हे बाले! यह मास श्रीकृष्ण का अत्यन्त प्यारा है और नाम से ही यह भगवान् का स्मारक है। इस मास में पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा, पूजा करने से समस्त कामनायें सिद्ध होती हैं। अतः इस पुरुषोत्तम मास का तू शीघ्र व्रत कर। पुरुषोत्तम भगवान् की तरह प्रसन्नता पूर्वक मैंने भी इस मास की सेवा की है।

एक समय क्रोध में मैंने अम्बरीष राजा को भस्म करने के लिये अर्थ कृत्या भेजी थी, सो हे बाले! तब हरि ने जलता हुआ सुदर्शन चक्र मुझको ही भस्म करने के लियै उसी समय मेरे पास भेजा। तब पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से ही वह चक्र हट गया। हे सुन्दरि! वह चक्र त्रैलोक्य को भस्म करने का सामर्थ्य रखने वाला जब मेरे पास आकर खाली चला गया तब मुझे बड़ा विस्मय हुआ। इसलिये हे सुभगे! तू श्रीपुरुषोत्तम मास का व्रत कर।’ इस प्रकार मुनि की कन्या को कहकर दुर्वासा ऋषि ने विराम लिया।

श्रीकृष्णजी बोले:-

‘हे राजन! दुर्वासा का वचन सुन भावों की प्रबलता के कारण असूया से प्रेरित वह कन्या मूर्खतावश दुर्वासा से बोली।

बाला बोली,:-

‘हे ब्रह्मन्! हे मुने! आपने जो कहा वह मुझे रुचता नहीं है। माघादि मास कैसे कुछ भी फल देनेवाले नहीं हैं ? कार्तिक मास कम है ? ऐसा आप कैसे कहते हैं ? सो कहिये। वैशाख मास सेवित हुआ क्या इच्छित कामों को नहीं देता है ? सदाशिव आदि से लेकर सब देवता सेवा करने पर क्या फल नहीं देते हैं ? अथवा पृथ्वी पर प्रत्यक्ष देव सूर्य और जगत् की माता देवी क्या सब कामनाओं को देने वाली नहीं हैं ? श्रीगणेश क्या सेवा पाकर इच्छित वर नहीं देते हैं ? व्यतिपात आदि योगों को और शर्व आदि देवताओं को भी, सबको उलंघन करके पुरुषोत्तम मास की प्रशंसा करते क्या आपको लज्जा नहीं आती है ? यह मास त़ बड़ा मलिन और सब कामों में निन्दित है। हे मुने! इस रवि की संक्रांति से रहित मास को आप श्रेष्ठ कैसे कह सकते हैं ? सब दुःखों को छुड़ाने वाले परम श्रीहरि को मैं जानती हूँ। हे देव! दिन-रात श्रीहरि का चिन्तन करती मैं जानकीपति राम और पार्वतीपति शंकर के सिवाय और किसी को नहीं देखती हूँ। हे विपेन्द्र! अन्य कोई भी देवता ऐसा नहीं है जो मेरे इस दुःख को दूर करे। अतः हे मुने! इन सब फलदाताओं को छोड़कर कैसे इस मलमास की स्तुति आप कर रहे हो ?

इस प्रकार ब्राह्मण कन्या का कहा हुआ सुनकर दुर्वासा मुनि शरीर से एकदम जाज्वल्यमान हो गये और नेत्र क्रोध से लाल हो गये। इस प्रकार क्रोध आने पर भी कृपा करके मित्र की कन्या को श्राप नहीं दिया और सोचने लगे कि यह मूर्खा है हित-अहित को नहीं जानती है। अभी बुद्धि इसकी पूर्ण नहीं है। पुरुषोत्तम मास के माहात्म्य का विद्वानों को भी पता नहीं है तो थोड़ी बुद्धि वाले पुरूष और विशेष करके कुमारियों को तो हो ही कहाँ से सकता है। यह कुमारी कन्या माता-पिता से रहित दु:खाग्नि से जली हुई है अतः अति उग्र मेरे श्राप को कैसे सहन कर सकती है ? इस प्रकार सोचकर कृपा से मन में उठे क्रोध को शान्त किया और स्वस्थ होकर दुर्वासा मुनि, उस अति विह्वल कन्या से बोले।

दुर्वासा बोले:-

हे मित्र पुत्रि! तेरे ऊपर मेरा कुछ भी क्रोध नहीं है, हे निर्भाग्ये! जो तेरे मन में आवे बैसा ही कर। हे बाले! और कुछ भविष्य कहता हूँ सुन। पुरुषोत्तम मास का जो तूने अनादर किया है उसका फल तुझे अवश्य मिलेगा। इस जन्म में मिले अथवा दूसरे जन्म में मिले। अब मैं नर-नारायण के आश्रम में जाऊँगा। तेरा पिता मेरा मित्र था इसलिये मैंने शाप नहीं दिया है, तू बाल भाव के कारण अपने शुभाशुभ तथा हिताहित को नहीं जानती है। शुभाशुभ भविष्य की कोई टाल नहीं सकता है। अच्छा हमारा बहुत समय व्यतीत हो गया, अब हम जाते हैं, तेरा कल्याण हो।’

श्रीकृष्ण बोले :-

ऐसा कहकर महाक्रोधी दुर्वासा मुनि शीघ्र चले गये। दुर्वासा ऋषि के जाते ही पुरुषोत्तम की उपेक्षा करने के कारण कन्या निष्प्रभा हो गयी। तदनन्तर बहुत देर तक कन्या ने सोच विचार कर यह निश्चय किया कि देवताओं के भी देवता, तत्काल फल देने वाले, पार्वतीपति शिव की तप द्वारा आराधना करूँगी। हे नृप! मेधावी ऋषि की कन्या ने मन से इस प्रकार निश्चय करके अपने आश्रम में ही रहकर भगवान् शंकर के कठिन तप करने को तत्पर हो गयी।

सूतजी बोले:-

बहुत फलों के दाता लक्ष्मीपति को और बैसे ही सावित्रीपति ब्रह्म को छोड़कर एवं दुर्वासा के प्रबल वचन की निन्दा कर वह ऋषि कन्या अपने आश्रम में ही अन्धक को मारने वाले शंकर की सेवा के लिये तत्पर हो गयी।

इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये दशमोऽध्यायः॥१०॥

Adhik Maas Katha Adhyay 11, Purushottam Maas Katha Adhyay 11

पुरुषोतम मास माहात्म्य/अधिक मास माहात्म्य अध्याय– 11 (Adhik Maas Adhyay 11, Purushottam Maas Adhyay 11)

पुरुषोतम मास माहात्म्य / अधिक मास माहात्म्य अध्याय – 11


adhik maas mahatmya adhyay 11

नारदजी बोले:-

सब मुनियों को भी जो दुष्कर कर्म है ऐसा बड़ा भारी तप जो इस कुमारी ने किया वह हे महामुने! हमसे सुनाइये ॥ १ ॥

श्रीनारायण बोले

अनन्तर ऋषि-कन्या ने भगवान्‌ शिव, शान्त, पंचमुख, सनातन महादेव को चिन्तन करके परम दारुण तप आरम्भ किया ॥ २ ॥

सर्पों का आभूषण पहिने, देव, नन्दी-भृंगी आदि गणों से सेबित, चौबीस तत्त्वों और तीनों गुणों से युक्त ॥ ३ ॥

अष्ट महासिद्धियों तथा प्रकृति और पुरुष से युक्त, अर्धचन्द्र से सुशोभित मस्तकवाले, जटा-जूट से विराजित ॥ ४ ॥

भगवान्‌ के प्रीत्यर्थ उस बाला ने परम तप आरम्भ किया। ग्रीष्म ऋतु के सूर्य होने पर पंचाग्नि के बीच में बैठकर ॥ ५ ॥

हेमन्त और शिशिर ऋतुओं में ठण्डे जल में बैठकर, खुले हुए मुखवाली जल में खिले हुए कमल की तरह शोभित होने लगी ॥ ६ ॥

सिर के नीचे फैली हुई काली और नीली अलकों से ढँकी हुई वह जल में ऐसी मालूम होने लगी जैसे कीचड़ की लता सेवारों के समूह से घिरी हुई हो ॥ ७ ॥

शीत के कारण नासिका से निकलती हुई शोभित धूम्‌राशि इस तरह दिखाई देने लगी जैसे कमल से मकरन्द पार करके भ्रमरपंक्ति जा रही हो ॥ ८ ॥

वर्षाकाल में आसन से युक्त चौतरे पर बिना छाया के सोती थी और वह सुन्दर अंगवाली प्रातः-सायं धूमपान करके रहती थी ॥ ९ ॥

उस कन्या के इस प्रकार के कठिन तप को सुन कर इन्द्र बड़ी चिन्ता को प्राप्त भए। सब देवताओं से दुष्प्रधर्षा और ऋषियों से स्पृहणीया ॥ १० ॥

उस ऋषि-कन्या के तप में लगे रहने पर हे नृपनन्दन! हे क्षत्रिय भूषण! नौ हजार वर्ष व्यतीत हो गये ॥ ११ ॥

उस बाला के तप से भगवान्‌ शंकर ने प्रसन्न होकर उसे अपना इन्द्रियातीत निज स्वरूप दिखलाया ॥ १२ ॥

भगवान्‌ शंकर को देखकर देह में जैसे प्राण आ जाय वैसे सहसा खड़ी हो गई और तप से दुर्बल होने पर भी वह बाला उस समय हृष्टपुष्ट हो गयी ॥ १३ ॥

बहुत वायु और घाम से क्लेश पाई हुई वह शंकर को बहुत अच्छी लगी और उस कन्या ने झुककर पार्वतीपति शंकरजी को प्रणाम किया ॥ १४ ॥

उन विश्वोवन्दित भगवान्‌ का मानसिक उपचारों से पूजन करके और भक्तियुक्त चित्त से जगत्‌ के नाथ की स्तुति करने लगी ॥ १५ ॥

कन्या बोली:-

हे पार्वतीप्रिय! हे प्राणनाथ! हे प्रभो! हे भर्ग! हे भूतेश! हे गौरीश! हे शम्भो! हे सोमसूर्याग्निनेत्र! हे तमः! हे मेरे आधार! मुण्डास्थिमालिन्‌! आपको प्रणाम है ॥ १६ ॥

अनेक तापों से व्याप्त है अंगों में पीड़ा जिसके ऐसा, तथा परम घोर संसाररूपी समुद्र में डूबा हुआ, दुष्ट सर्पों तथा काल के तीक्ष्ण दांतों से डँसा हुआ मनुष्य भी यदि आपकी शरण में आ जाए तो मुक्त हो जाता है ॥ १७ ॥

हे विभो! जिन आपने बाणासुर को अपनाया और मरी हुई अलर्क राजा की पत्नीो को जिलाया ऐसे आप हे दयानाथ! भूतेश! चण्डीिश! भव्य! भवत्राण! मृत्युञ्जय! प्राणनाथ! ॥ १८ ॥

हे दक्षप्रजापति के मख को ध्वंस करने वाले! हे समस्त शत्रुओं के नाशक! हे सदा भक्तों को संसार से छुड़ाने वाले! हे जन्म के हर्ता, हे प्रथम सृष्टि के कर्ता! हे प्राणनाथ! हे पाप के नाश करने वाले! आप को नमस्कार है। अपने सेवकों की रक्षा कीजिये ॥ १९ ॥

हे नृप! बड़ी भाग्यवती मेधावी की तपस्विनी कन्या इस प्रकार मन से और वाणी से शंकर की स्तुति करके चुप हो गयी ॥ २० ॥

श्रीकृष्ण बोले – कन्या द्वारा की हुई स्तुति सुनकर और उसके किये हुए उग्रतप से प्रसन्न मुखकमल सदाशिव कन्या से बोले ॥ २१ ॥

हे तपस्विनि! तेरा कल्याण हो, तेरे मन में जो अभीष्ट हो वह वर तू माँग, हे महाभागे! मैं प्रसन्न हूँ, तू खेद मत कर ॥ २२ ॥

ऐसा भगवान्‌ शंकर का वचन सुन वह कुमारी अत्यन्त आनन्द को  प्राप्त हुई और हे राजन्‌! प्रसन्न हुए सदाशिव से बोली ॥ २३ ॥

कन्या बोली :-

हे दीनानाथ! हे दयासिन्धो! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो हे प्रभो! मेरी कामना पूर्ण करने में देर न करें ॥ २४ ॥

हे महादेव! मुझको पति दीजिये, पति दीजिये, पति दीजिये, मैं पति चाहती हूँ, पति दीजिये, मैंने हृदय में और कुछ नहीं सोचा है ॥ २५ ॥

वह ऋषिकन्या इस प्रकार महादेव से कह कर चुप हो गयी तब यह सुन कर महादेव जी उससे बोले ॥ २६ ॥

शिव बोले – हे मुनिकन्यके! तूने जैसा अपने मुख से कहा है वैसा ही होगा क्योंकि तूने पाँच बार पति माँगा है ॥ २७ ॥

अतः हे सुन्दरी! तेरे पाँच पति होंगे और वे पाँचों वीर, सर्वधर्मवेत्ता, सज्जन, सत्यपराक्रमी ॥ २८ ॥

यज्ञ करनेवाले, अपने गुणों से प्रसिद्ध, सत्य प्रसिद्ध जितेन्द्रिय, तेरा मुख देखने वाले,सभी क्षत्रीय और गुणवान्‌ होंगे ॥ २९ ॥

श्रीकृष्ण बोले:-

न तो अधिक प्रिय, न तो अधिक अप्रिय ऐसे महादेव के बचन को सुनकर, बोलने में चतुरा कन्या झुककर बोली ॥ ३० ॥

बाला बोली :-

हे गिरिजाकान्त! सदाशिव! संसार में एक स्त्री का एक ही पति होता है, अतः पाँच पति का वर देकर, लोक में मेरी हँसी न कराइये ॥ ३१ ॥

एक स्त्री पाँच पतिवाली न देखी गयी है और न सुनी गयी है। हाँ, एक पुरुष की पाँच स्त्रियाँ तो हो सकती हैं ॥ ३२ ॥

हे शम्भो हे कृपानिधे! आपकी सेविका मैं पाँच पतियों वाली कैसे हो सकती हूँ आपको मेरे लिये ऐसा कहना उचित नहीं है ॥ ३३ ॥

आपकी सेविका होने के कारण जो लज्जा मुझे हो रही है, वह आप अपने को ही समझिये। कन्या का यह वचन सुनकर शंकरजी पुनः उससे बोले ॥ ३४ ॥

शंकरजी बोले:-

हे भीरु! इस जन्म में तुझे पति सुख नहीं मिलेगा, दूसरे जन्म में जब तू तपोबल से बिना योनि के उत्पन्न होगी ॥ ३५ ॥

तब पति सुख को भोग कर अनन्तर परमपद्‌ को प्राप्त होगी क्योंकि मेरी प्रिय मूर्ति दुर्वासा का तूने पहिले अपमान किया है ॥ ३६ ॥

हे सुभ्रु! वह दुर्वासा यदि क्रोध करें तो तीनों भुवनों को जला सकते हैं सो तूने अभिमान वश ब्रह्मतेज का मर्दन किया है ॥ ३७ ॥

जिस अधिमास को भगवान्‌ कृष्ण ने अपना ऐश्व र्य दे दिया उस भगवान्‌ के प्रिय पुरुषोत्तममास का व्रत तूने नहीं किया ॥ ३८ ॥

मैं ब्रह्मा आदि से लेकर सब देवता, नारद आदि से लेकर सब तपस्वी, जिसकी आज्ञा सदा मानते चले आये हैं, हे बाले! उसकी आज्ञा का कौन उलंघन करता है? ॥ ३९ ॥

लोकपूजित पुरुषोत्तम मास की दुर्वासा की आज्ञा से तूने पूजा नहीं की हे मूढ़े! द्विजात्मजे! इसी लिये तेरे पाँच पति होंगे ॥ ४० ॥

हे बाले! पुरुषोत्तम के अनादर करने से अब अन्यथा नहीं हो सकता है। जो उस पुरुषोत्तम की निन्दा करता है वह रौरव नरक का भागी होता है ॥ ४१ ॥

पुरुषोत्तम का अपमान करने वाले को विपरीत ही फल होता है, यह बात कभी अन्यथा नहीं हो सकती है। पुरुषोत्तम के जो भक्त हैं वे पुत्र, पौत्र और धनवाले होते हैं ॥ ४२ ॥

और वे इस लोक को तथा परलोक की सिद्धि को प्राप्त हुए हैं, प्राप्त होंगे और प्राप्त हो रहे हैं। और हम सब देवता लोग भी पुरुषोत्तम की सेवा करने वाले हैं ॥ ४३ ॥

जिस पुरुषोत्तम मास में व्रतादिक से पुरुषोत्तम शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं उस सेवा करने योग्य मास को हे सुमध्यमे! हम लोग कैसे न भजें? ॥ ४४ ॥

उचित और अनुचित विचार की चर्चा करने वाले अतएव अनुकरणीय जो मुनि हैं उन अति उत्कट श्रेष्ठ तपस्वी पुरुषों का वचन कैसे मिथ्या हो सकता है? कहो ॥ ४५ ॥

इस प्रकार कथन करते हुए भगवान्‌ नीलकण्ठ शीघ्र ही अन्तर्धान हो गये और वह बाला भ्रष्ट मृगी की तरह चकित सी हो गयी ॥ ४६ ॥

सूतजी बोले:-

हे मुनीश! रेखासदृश चन्द्रमा से युक्त मस्तकवाले सदाशिव जब उत्तर दिशा के प्रति चले गये तब वृत्रासुर को मारकर जैसे इन्द्र को चिन्ता हुई थी उसी प्रकार मुनिराज की कन्या को चिन्ता बाधा करने लगी ॥ ४७ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये एकादशोऽध्यायः समाप्तः ॥ ११ ॥

Adhik Maas Katha Adhyay 12, Purushottam Maas Katha Adhyay 12

पुरुषोतम मास माहात्म्य/अधिक मास माहात्म्य अध्याय– 12 (Adhik Maas Adhyay 12, Purushottam Maas Adhyay 12)

पुरुषोतम मास माहात्म्य / अधिक मास माहात्म्य अध्याय – 12


adhik maas mahatmya adhyay 12

नारदजी बोले:-

जब भगवान् शंकर चले गये तब हे प्रभो! उस बाला ने शोककर क्या किया! सो मुझ विनीत को धर्मसिद्धि के लिए कहिये ॥ १ ॥

इसी प्रकार राजा युधिष्ठिर ने भगवान् कृष्ण से पूछा था सो भगवान् ने राजा के प्रति जो कहा सो हम तुमसे कहते हैं सुनो ॥ २ ॥

श्रीकृष्ण बोले:-

 हे राजन! इस प्रकार जब शिवजी चले गये तब वह बाला प्रभावित हो गयी और लम्बे श्वािस लेती हुई, बड़ी डरी और वह कृशोदरी अश्रुपातपूर्वक रोने लगी ॥ ३ ॥

हृदयाग्नि से उठी हुई ज्वाला से जलते हुए अंगवाली वह तपस्विनी कन्या वनाग्नि से जले हुए पत्ते वाली लता की तरह हो गयी ॥ ४ ॥

दुःख और ईर्ष्या को प्राप्त उस कन्या का बहुत समय व्यतीत हो गया। जिस प्रकार चूहे के बिल में घुसकर आक्रमण करके सर्प उसे वश में कर लेता है उसी प्रकार उपर्युक्त शोचनीय अवस्था को प्राप्त उस तपस्विनी बाला पर उस प्रभु काल ने आक्रमण कर उसे वश में कर लिया ॥ ५-६ ॥

वर्षा ऋतु में मेघ से घिरे हुए आकाश में बिजली चमक कर जैसे नष्ट हो जाती है उसी प्रकार तपस्या से जले हुए पापवाली वह कन्या अपने आश्रम में मर गयी ॥ ७ ॥

उसी समय धर्मिष्ठ यज्ञसेन नामक राजा ने बड़ी सामग्रियों से युक्त उत्तम यज्ञ किया ॥ ८ ॥

उस यज्ञकुण्ड से सुवर्ण के समान कान्ति वाली एक लड़की उत्पन्न हुई । वही कुमारी द्रुपदराज की कन्या के नाम से संसार में विख्यात हुई ॥ ९ ॥

पहिले जो मेधावी ऋषि की कन्या थी वही सब लोकों में द्रौपदी नाम से प्रसिद्ध हुई । उसी को स्वयंवर में मछली को वेधकर ॥ १० ॥

भीष्म कर्ण आदि बहुत से राजाओं को तृण के समान कर क्षुभित रजमण्डदल में अर्जुन ने पांचाली को पाया ॥ ११ ॥

हे मुने! वही द्रौपदी दुष्ट दुःशासन द्वारा बाल पकड़ कर खींची गयी और उसे हृदय  विदीर्ण करने वाले वचन सुनाये गये ॥ १२ ॥

पुरुषोत्तम की अवहेलना करने के कारण मैंने भी उसकी उपेक्षा की। जब वह मेरे में स्नेह करके मेरा नाम बराबर लेने लगी ॥ १३ ॥

हे दामोदर! हे दयासिन्धो! हे कृष्ण! हे जगत्पते! हे नाथ रमानाथ! हे केशव! हे क्लेशनाशन! ॥ १४ ॥

मेरे माता, पिता, भ्रातृवर्ग, सहेलियें, बहिन, भाञ्जे, बन्धु, इष्ट, पति आदि कोई भी नहीं है। हे हृषीकेश! मेरे तो आप ही सब कुछ हैं ॥ १५ ॥

हे गोविन्द! हे गोपिकानाथ! दीनबन्धो! दयानिधे! दुःशासन से आक्रमण की गई मुझे क्या आप नहीं जानते ॥ १६ ॥

यद्यपि पहली पुकार में मैंने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया था, पर जब दुःशासन से पराभूत होकर उसने मेरा पुनः स्मरण किया ॥ १७ ॥

तब गरुड़ पर चढ़ शीघ्र वहाँ पहुँच कर मैंने हे राजन्‌! उसे बहुत से वस्त्रों से परिपूर्ण कर दिया ॥ १८ ॥

सदा मेरे में स्नेह करने वाली, मैं ही हूँ प्राण जिसके ऐसी, सदा मेरे भजन में परायण, मेरी अत्यन्त प्रिया, सती, सखी, मुझको प्राणों के समान होने पर भी पुरुषोत्तम की अवहेलना करने के कारण उसकी उपेक्षा करनी पड़ी। पुरुषोत्तम का तिरस्कार करने वाले का मैं पतन कर देता हूँ ॥ १९-२० ॥

यह पुरुषोत्तम मुनियों और देवताओं से भी सेव्य है, फिर समस्त कामनाओं को देने वाला यह पुरुषोत्तम मनुष्यों द्वारा तो सेवनीय है ही ॥ २१ ॥

अतः आगामी पुरुषोत्तम की आराधना करो। चौदह वर्ष के सम्पूर्ण होने पर तुम्हारा कल्याण होगा ॥ २२ ॥

हे पाण्डुनन्दन! जिन पुरुषों ने द्रौपदी के बालों को खींचते हुए देखा है, हे महाराज! उनकी स्त्रियों की अलकों को मैं क्रोध से काटूँगा ॥ २३ ॥

दुर्योधन आदि राजाओं को यमराज के भवन को पहुँचाऊँगा, बाद तुम समस्त शत्रुओं का नाश कर राजा होंगे ॥ २४ ॥

न मेरे को लक्ष्मी प्रिय, न मेरे को बलभद्र जी प्रिय और न वैसे मेरे को देवी देवकी, न प्रद्युम्न, न सात्यकि प्रिय हैं ॥ २५ ॥

जैसे मेरे को भक्त प्रिय हैं वैसा कोई प्रिय नहीं है। जिसने मेरे भक्तों को पीड़ित किया उससे मैं सदा पीड़ित रहता हूँ ॥ २६ ॥

हे पाण्डव! उसके समान मेरा अन्य कोई शत्रु नहीं है, उसके अपराध का फल देने वाला यमराज है क्योंकि वह दुष्ट दण्ड देने के लिए भी मेरे से देखने के योग्य नहीं है ॥ २७ ॥

श्रीनारायण बोले :-

श्रीकृष्ण ने उन पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरादिकों को और द्रौपदी को समझा कर द्वारका जाने की इच्छा से कहा ॥ २८ ॥

हे राजन्‌! वियोग से व्याकुल द्वारका पुरी को आज जाऊँगा जहाँ पर महाभाग वसुदेव जी, हमारे बड़े भाई बलदेवजी ॥ २९ ॥

हमारी माता देवी देवकी तथा गद, साम्ब आदि और आहुक आदि यादव, रुक्मिणी आदि जो स्त्रियाँ हैं ॥ ३० ॥

दर्शन की उत्कण्ठा वाले वे सब हमारे आगमन की कामना से टकटकी लगाकर हमारा ही चिन्तन करते होंगे ॥ ३१ ॥

श्रीनारायण बोले –

इस प्रकार कहते हुए देवेश श्रीकृष्ण के गमन को जानकर पाण्डु-पुत्र किस प्रकार गद्‌गद कण्ठ से बोले ॥ ३२ ॥

जिस प्रकार जल में रहने वालों का जीवन जल है उसी तरह हम लोगों के जीवन तो आप ही हैं। हे जनार्दन! थोड़े ही दिनों के बाद फिर दर्शन हों ॥ ३३ ॥

पाण्डवों के नाथ हरि हैं और तीनों लोको में दूसरा कोई नहीं है, इस प्रकार सामने ही सब लोग कहते हैं अतः हम लोगों की हमेशा रक्षा करें ॥ ३४ ॥

हे जगदीश्वमर! हम लोग आप के हैं, भूलियेगा नहीं। हम लोगों के चित्तरूपी भ्रमरों का जीवन आपका चरण कमल ही है ॥ ३५ ॥

आप ही हमारे आधार हैं, इसलिए बारम्बार हम सब प्रार्थना करते हैं। इन पाण्डुपुत्रों के निरन्तर इस तरह कहते रहने पर श्रीकृष्णचन्द्र ॥ ३६ ॥

प्रेमानन्द में मग्न होकर धीरे-धीरे रथ पर सवार होकर पीछे चलने वाले पाण्डुपुत्रों को लौटाकर द्वारका पुरी को गये ॥ ३७ ॥

श्रीनारायण बोले:-

इसके बाद श्रीद्वारकानाथ श्रीकृष्णचन्द्र के द्वारका पुरी जाने पर, राजा युधिष्ठिर अपने छोटे भाइयों के साथ तप करते हुए तीर्थों मे भ्रमण करते भये ॥ ३८ ॥

हे ब्रह्मन्‌! नारद! भगवान्‌ के प्रिय पुरुषोत्तम मास में मन लगाकर और श्रीकृष्णचन्द्र के वचनों का स्मरण करते हुए, अपने छोटे भाइयों से तथा द्रौपदी से राजा युधिष्ठिर बोले – ॥ ३९ ॥

अहो! पुरुषोत्तम मास में होने वाले अत्यन्त उग्र पुरुषोत्तम का माहात्म्य सुना है, पुरुषोत्तम भगवान्‌ के पूजन किये बिना सुख किस तरह मिलेगा? ॥ ४० ॥

इस भारतवर्ष में वह धन्य है, वह पूज्य है, वही श्रेष्ठ है, जो अनेक प्रकार के नियमों से पुरुषोत्तम भगवान्‌ का पूजनार्चन किया करता है ॥ ४१ ॥

इस तरह समस्त तीर्थों में भ्रमण करते हुए पाण्डुपुत्र पुरुषोत्तम मास के आने पर विधिपूर्वक व्रत करते भये ॥ ४२ ॥

हे मुने! नारद! व्रत के अन्त में चौदह वर्ष के पूर्ण होने पर श्रीकृष्ण भगवान्‌ की कृपा से अतुल निष्कण्टक राज्य को प्राप्त किये ॥ ४३ ॥

पूर्वकाल में सूर्यवंश में होने वाला दृढ़धन्वा नाम का राजा पुरुषोत्तम मास के सेवन से बड़ी लक्ष्मी ॥ ४४ ॥

पुत्र पौत्र का सुख और अनेक प्रकार के भोगों को भोगकर, योगियों को भी दुर्लभ जो भगवान्‌ का वैकुण्ठ लोक है वहाँ गया ॥ ४५ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ! नारद! इस पुरुषोत्तम मास के अतुल माहात्य को करोड़ों कल्प समय मिलने पर भी मैं कहने को समर्थ नहीं हूँ ॥ ४६ ॥

सूतजी बोले :-

हे विप्र लोग! पुरुषोत्तम मास का माहात्म्य कृष्णद्वैपायन (व्यास जी) से मैंने सुना है तथापि कहने को मैं समर्थ नहीं हूँ ॥ ४७ ॥

इस पुरुषोत्तम मास के अखिल माहात्म्य को स्वयं नारायण जानते हैं या साक्षात्‌ वैकुण्ठवासी हरि भगवान्‌ जानते हैं ॥ ४८ ॥

परन्तु ब्रह्मादि देवताओं से नमस्कार किये जाने वाले हैं चरणपीठ जिनके, ऐसे गोलोकनाथ श्रीकृष्णचन्द्र भी अपनाये हुए पुरुषोत्तम मास का सम्पूर्ण माहात्म्य नहीं जानते हैं तो मनुष्य कहाँ से जान सकता है? ॥ ४९ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे पुरुषोत्तमव्रतोपदेशो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

Adhik Maas Katha Adhyay 13, Purushottam Maas Katha Adhyay 13

पुरुषोतम मास माहात्म्य/अधिक मास माहात्म्य अध्याय– 13 (Adhik Maas Adhyay 13, Purushottam Maas Adhyay 13)

पुरुषोतम मास माहात्म्य / अधिक मास माहात्म्य अध्याय – 13


adhik maas mahatmya adhyay 13

ऋषि लोग बोले:-

हे सूत! हे महाभाग! हे सूत! हे बोलने वालों में श्रेष्ठ! पुरुषोत्तम के सेवन से राजा दृढ़धन्वा शोभन राज्य, पुत्र आदि तथा पतिव्रता स्त्री को किस तरह प्राप्त किया और योगियों को भी दुर्लभ भगवान्‌ के लोक को किस तरह प्राप्त हुआ? ॥ १-२ ॥

हे तात! आपके मुखकमल से बार-बार कथासार सुनने वाले हम लोगों को अमृत-पान करने वालों के समान कथामृत-पान से तृप्ति नहीं होती है ॥ ३ ॥

इस कारण से इस पुरातन इतिहास को विस्तार पूर्वक कहिये। हमारे भाग्य के बल से ही ब्रह्मा ने आपको दिखलाया है ॥ ४ ॥
सूतजी बोले:-

हे विप्र लोग! सनातन मुनि नारायण ने इस पुरातन इतिहास को नारद जी के प्रति कहा है वही इतिहास इस समय मैं आप लोगों से कहता हूँ ॥ ५ ॥

मैंने जैसा गुरु के मुख से राजा दृढ़धन्वा का पापनाशक चरित्र पढ़ा है उसको सब मुनि श्रवण करें ॥ ६ ॥

श्रीनारायण बोले:-

हे ब्रह्मन्‌! नारद! सुनिये। मैं पवित्र करने वाली गंगा के समान राजा दृढ़धन्वा की सुन्दर तथा प्राचीन कथा कहूँगा ॥ ७ ॥

हैहय देश का रक्षक, श्रीमान्‌ बुद्धिमान्‌ तथा सत्यपराक्रमी चित्रधर्मा नाम का राजा भया ॥ ८ ॥

उसको दृढ़धन्वा नाम से प्रसिद्ध अति तेजस्वी, सब गुणों से युक्त, सत्य बोलने वाला, धर्मात्मा और पवित्र आचरण वाला पुत्र हुआ ॥ ९ ॥

कान तक लंबे नेत्र वाला, चौड़ी छाती वाला, बड़ी भुजा वाला, महातेजस्वी वह राजा दृढ़धन्वा प्रशस्त गुण समूहों के साथ-साथ बढ़ता भया ॥ १० ॥

वह चतुर राजा दृढ़धन्वा प्रसन्नता के साथ गुरु के मुख से एक बार कहने मात्र से पूर्व में पढ़े हुये के समान व्याकरण आदि छः अंगों के साथ चार वेदों का अध्ययन कर ॥ ११ ॥

गुरु को दक्षिणा देकर और विधि पूर्वक उनकी पूजा कर बिद्धिमान्‌ राजा गुरु की आज्ञा से पिता चित्रधर्मा के पुर को गया ॥ १२ ॥

अपने नगर में वास करने वाले प्रजावर्ग के नेत्रों को आनन्दित करता हुआ। जिस पुत्र को देख कर राजा चित्रधर्मा भी अत्यन्त हर्ष को प्राप्त हुआ ॥ १३ ॥

पुत्र जवान हो, सम्पूर्ण धर्म को जानने वाला हो और प्रजापालन में समर्थ हो, इससे बढ़ कर सारशून्य इस संसार में और क्या है? अर्थात्‌ कुछ नहीं है ॥ १४ ॥

अब मैं दो भुजावाले, मुरली (वंशी) को धारण करने वाले, प्रसन्न मुख वाले, शान्त तथा भक्तों को अभय देनेवाले श्रीकृष्णचन्द्र की आराधना करता हूँ ॥ १५ ॥

जिस तरह ध्रुव, अम्बरीष, शर्धाति, ययाति प्रमुख राजा और शिवि, रन्तिदेव, शशबिन्दु, भगीरथ ॥ १६ ॥

भीष्म, विदुर, दुष्यन्त और भरत, पृथु, उत्तानपाद, प्रह्‌लाद, विभीषण ॥ १७ ॥

ये सब राजा तथा और अन्य राजा लोग भी अनेकों लोगों को त्याग कर, इस अनित्य शरीर से पुरुषोत्तम भगवान्‌ का आराधन कर, नित्य (सदा रहनेवाले) विष्णुपद को चले गये ॥ १८ ॥

उसी तरह स्त्री, मकान पुत्र आदि में स्नेहमय बन्धन को तोड़कर वन में जाकर हरि का सेवन करना हमारा भी कर्तव्य है ॥ १९ ॥

ऐसा मन में निश्चय कर, समर्थ राजा दृढ़धन्वा को राज्य का भार देकर स्वयं विरक्त हो, शीघ्र पुलह ऋषि के आश्रम को चला गया ॥ २० ॥

वहाँ जाकर सम्पूर्ण कामनाओं से निस्पृह हो और भोजन त्याग कर हर समय मन से श्रीकृष्णचन्द्र का स्मरण करता हुआ तप करने लगा ॥ २१ ॥

कुछ समय तक तप करके वह राजा चित्रवर्मा हरि भगवान्‌ के परम धाम को चला गया। राजा दृढ़धन्वा ने भी अपने पिता की वैष्णवी गति को सुना ॥ २२ ॥

उस समय पिता के परमधाम गमन से हर्ष और वियोग होने से शोक-युक्त राजा दृढ़धन्वा पितृ-भक्ति से विद्वानों के वचन में स्थित होकर, पारलौकिक क्रिया को करता भया ॥ २३ ॥

नीतिशास्त्र में विशारद (चतुर) राजा  दृढ़धन्वा अत्यन्त शोभित पवित्र पुष्करावर्तक नगर में राज्य करने लगा ॥ २४ ॥

अच्छे स्वभाववाली विदर्भराज की कन्या उसकी स्त्री गुणसुन्दरी नाम की थी, पृथ्वी पर रूप में उसके समान दूसरी स्त्री नहीं थी ॥ २५ ॥

उस गुणसुन्दरी ने सुन्दर, चतुर, शुभ आचरण वाले चार पुत्रों को उत्पन्न किया और सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त चारुमती नामक कन्या को उत्पन्न किया ॥ २६ ॥

चित्रवाक्‌, चित्रवाह, मणिमान्‌ और चित्रकुण्डल नाम वाले वे सब बड़े मानी, शूर अपने-अपने नाम से पृथक्‌ विख्यात होते भये ॥ २७ ॥

राजा दृढ़धन्वा गुणों करके प्रसिद्ध, शान्त, दान्त, दृढ़प्रतिज्ञ, रूपवान्‌, गुणवान्‌, वीर, श्रीमान्‌, स्वभाव से सुन्दर ॥ २८ ॥

चार वेद और व्याकरण आदि ६ अंगों को जानने वाला, वाग्मी (वाक्‌चतुर), धनुर्विद्या में निपुण, अरिषड्‌वर्ग (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य) को जीतने वाला, और शत्रु-समुदाय का नाश करने वाला ॥ २९ ॥

क्षमा में पृथिवी के समान, गम्भीरता में समुद्र के समान, समता (सम व्यवहार) में पितामह (ब्रह्मा) के समान, प्रसन्नता में शंकर के समान ॥ ३० ॥

एकपत्नी व्रत (एक ही स्त्री से विवाह करने का व्रत) को करने वाले दूसरे रामचन्द्र के समान, अत्यन्त उग्र पराक्रमशाली दूसरे कार्तवीर्य (सहस्रार्जुन) के समान था ॥ ३१ ॥

नारायण बोले :-

एक समय रात्रि में शयन किये हुए उस राजा दृढ़धन्वा को चिन्ता हुई कि अहो! यह वैभव (सम्पत्ति) किस महान्‌ पुण्य के कारण हमें प्राप्त हुआ है ॥ ३२ ॥

न तो मैंने तप किया, न तो दान दिया, न तो कहीं पर कुछ हवन ही किया। मैं इस भाग्योदय का कारण किससे पूछूँ ॥ ३३ ॥

इस प्रकार चिन्ता करते ही राजा दृढ़धन्वा की रात्रि बीत गई। प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त में उठकर विधिपूर्वक स्नान कर ॥ ३४ ॥

उदय को प्राप्त सूर्यनारायण का उपस्थान कर, भगवान्‌ की कला की पूजा कर अर्थात्‌ देवमन्दिरों में जाकर देवता का पूजन कर, ब्राह्मणों को दान देकर तथा नमस्कार करके घोड़े पर सवार हो गया ॥ ३५ ॥

उसके बाद शिकार खेलने की इच्छा से शीघ्र वन को गया वहाँ पर बहुत से मृग, वराह (सूअर), सिंह और गवयों (चँवरी गाय) का शिकार किया ॥ ३६ ॥

उसी समय राजा दृढ़धन्वा के बाण से घायल होकर कोई मृग बाण सहित शीघ्र एक वन से दूसरे वन को चला गया ॥ ३७ ॥

रुधिर गिरे हुए मार्ग से राजा भी मृग के पीछे गया। परन्तु मृग कहीं झाड़ी में छिप गया और राजा उस वन में उसे खोजता ही रह गया ॥ ३८ ॥

पिपासा से व्याकुल उस राजा ने समुद्र के समान एक तालाब को देखा वहाँ जल्दी से जाकर और पानी पीकर तीर पर चला आया ॥ ३९ ॥

वहाँ घनी छाया वाले एक विशाल बट वृक्ष को देखा। उस वृक्ष की जटा में घोड़े को बाँधकर राजा वहीं बैठ गया ॥ ४० ॥

उसी समय वहाँ पर कोई एक परम सुन्दर सुग्गा राजा को मोहित करने वाली तुलना रहित मनुष्य वाणी को बोलता हुआ आया ॥ ४१ ॥

केवल राजा को बैठे देख उसको सम्बोधित करता हुआ एक ही श्लोमक को बार-बार पढ़ने लगा ॥ ४२ ॥

कि इस पृथिवी पर विद्यमान अतुल सुख को देखकर तू तत्त्व (आत्मा) का चिन्तन नहीं करता है तो इस संसार के पार को कैसे जायगा? ॥ ४३ ॥

बार-बार इस श्लोनक को राजा दृढ़धन्वा के सामने पढ़ने लगा। राजा उसके वचन को सुनकर प्रसन्न हुआ और उसपर मोहित हो गया ॥ ४४ ॥

कि इस शुक पक्षी ने दुःख से जानने योग्य, सार भरे हुए नारिकेल फल के समान अगम्य एक ही श्लोहक को बार-बार पढ़ते हुए क्या कहा? ॥ ४५ ॥

क्या यह कृष्णद्वैपायन (वेदव्यास) के श्रेष्ठ पुत्र शुकदेवजी तो नहीं हैं? जो कि श्रीकृष्णचन्द्र के सेवक मुझको मूढ़ और संसार सागर में डूबा हुआ देखकर ॥ ४६ ॥

राजा परीक्षित के समान कृपा कर उद्धार करने की इच्छा से मेरे पास आये हैं? इस तरह चिन्ता करते हुए राजा दृढ़धन्वा की सेना समीप आ गई ॥ ४७ ॥

शुक पक्षी राजा को उपदेश देकर स्वयं अन्तर्धान (अलक्षित) हो गया। उस शुकपक्षी के वचन को स्मरण करता हुआ राजा अपने पुर में आकर ॥ ४८ ॥

बुलाने पर भी नहीं बोलता है और निद्रा रहित हो उसने भोजन को भी त्याग दिया था, तब एकान्त में उसकी रानी ने आकर राजा से पूछा ॥ ४९ ॥

गुणसुन्दरी बोली:-

हे पुरुषों में श्रेष्ठ! यह मन में मलिनता क्यों हुई? हे भूपाल! पृथिवी के रक्षक! उठिये उठिये। भोगों को भोगिये और वचन बोलिए ॥ ५० ॥

हे पुरुषों में श्रेष्ठ! यह मन में मलिनता क्यों हुई? हे भूपाल! पृथिवी के रक्षक! उठिये उठिये। भोगों को भोगिये और वचन बोलिए ॥ ५० ॥

देवताओं से भी दुःख से जानने योग्य उस शुक पक्षी के सत्य वचन का स्मरण करता हुआ रानी गुणसुन्दरी के प्रार्थना करने पर भी राजा दृढ़धन्वा कुछ नहीं बोला ॥ ५१ ॥

पति के दुःख से अत्यन्त पीड़ित वह रानी भी दीर्घ स्वाँस लेकर अपने स्वामी की चिन्ता के उत्कट कारण को नहीं जान सकी ॥ ५२ ॥

इस प्रकार चिन्ता में मग्न राजा का कितना ही समय बीत गया, परन्तु सन्देह-सागर से पार करने वाला कोई भी कारण वह देख न सकी ॥ ५३ ॥

नारदजी बोले :-

हे मुने! इस तरह चिन्ता को करते हुए पृथिवीपति राजा दृढ़धन्वा का क्या हुआ सो आप कहें। क्योंकि हे मुने! निर्मल वैष्णव चरित्र थोड़ा भी यदि सुना जाय तो पापों का नाश हो जाता है ॥ ५४ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे दृढधन्वोपाख्याने दृढधन्वनोमनःखेदो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

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