Holi Katha in Hindi, होली की कथा
पंचांग के अनुसार, होली चैत्र कृष्ण प्रतिपदा तिथि पर मनाई जाती है इसलिए रंगोत्सव इसी दिन होगा। इसे धुलेंडी, धुलंडी आदि नामों से भी जाना जाता है। होली के त्योहार को बुराई पर अच्छाई की जीत के तौर पर देखा जाता है। इस दिन लोग एक दूसरे को रंग-गुलाल लगाते हैं, गले मिलते हैं और पकवान खाते हैं। वहीं होली को लेकर भक्त प्रह्लाद, होलिका और हिरण्यकश्यपु की कथा प्रचलित है। आइये जानते हैं होली की व्रत कथा।होली आज से 39 लाख वर्ष पहले, यानी राम-कृष्ण के काल से भी पहले, सतयुग से मनाई जा रही है। एक युग, जिसके साथ प्राय: सबकुछ ख़त्म हो जाता है, होली उसे पार कर भी दूसरे युगों में प्रवेश करते हुए कलियुग में भी न सिर्फ हमारी ख़ुशियों का कारण है, बल्कि यह संदेश देने में भी सक्षम है कि हर बुराई का अंत निश्चित है।
सतयुग की है सबसे पुरानी और प्रचलित कथा
होली मनाने की शुरुआत कब और कैसे हुई, इस बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं। किंतु, सबसे पुरानी और प्रचलित कथा सतयुग है। ऐसे में कह सकते हैं कि होली सतयुग से मनाई जाती रही है। वह आगे कहते हैं, चार युग होते हैं- सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग। हमारे शास्त्रों में 1 युग लाखों वर्षों का बताया गया है। सतयुग करीब 17 लाख 28 हजार वर्ष, त्रेतायुग 12 लाख 96 हजार वर्ष, द्वापर युग 8 लाख 64 हजार वर्ष, तो कलियुग 4 लाख 32 हजार वर्ष का होना है। इस हिसाब से ही गणना कहती है कि होली 39 लाख वर्ष पहले, सतयुग से मनाई जा रही है। तब, भगवान ने नृसिंह अवतार लिया था और हिरण्यकश्यप का वध किया था।
त्रिदेव इस सृष्टि का संचालन करते हैं। ब्रह्मा सृजक हैं, विष्णु पालनहार, तो शिव संहारक। इसके साथ ही विष्णु संतुलन बनाए रखने के लिए भी समय-समय पर अवतार लेते रहते हैं। गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु के 10 अवतारों का जिक्र है। सतयुग में उन्होंने मत्स्य, हयग्रीव, कूर्म, वाराह और नृसिंह अवतार लिया, तो त्रेता में वामन, परशुराम और श्रीराम का। द्वापर में वह श्रीकृष्ण रूप में भक्तों के बीच आए। कलियुग में वह कल्कि अवतार लेंगे। वह समय कलियुग और सतयुग के संधिकाल का होगा। अभी तो कलियुग की शुरुआत ही हुई है। प्रभु अपने सभी अवतारों में दुष्टों का संहार करते हैं, तो अपनी लीलाओं से जीवन जीने का तरीका भी सिखाते हैं। होली का त्योहार भी कुछ ऐसा ही है, जिसका आरंभ सतयुग में भगवान के नृसिंह अवतार के समय हुआ।
हिरण्यकश्यपु, होलिका और प्रह्लाद की कथा
आदिकाल में ऋषि कश्यप और दिति के दो पुत्र और दो पुत्रियां हुईं- हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यपु, सिंहिका और होलिका। भगवान विष्णु के वराह अवतार ने हिरण्याक्ष का वध किया था, क्योंकि उसने धरती को जल में डुबो दिया था। इस कारण हिरण्यकश्यप उन्हें दुश्मन मानता था। वहीं सिंहिका को हनुमानजी ने लंका जाते हुए मार्ग में मारा था। हिरण्यकश्यप का विवाह कयाधु से हुआ, जिससे उसे प्रह्लाद नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। हिरण्यकश्यप ने मनचाहे वरदान के लिए ब्रह्मा की तपस्या शुरू की। हिरण्यकशिपु जब तपस्या में लीन था तब उसी दौरान देवों ने असुरों पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया था और देवराज इन्द्र हिरण्यकशिपु की गर्भिणी पत्नी 'कयाधु' को बंधी बनाकर ले गए थे, परंतु बीच रास्ते में ही उनकी मुलाकात देवऋषि नारद से हुई। नारदजी ने इंद्र को उपदेश दिया कि आप ये पाप कर रहे हैं। उपदेश सुनकर इंद्र हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधु को महर्षि के आश्रम में छोड़कर स्वयं देवलोक चले गए। उस समय देवर्षि नारद मुनि ने कयाधु की रक्षा की और अपने आश्रम में स्थान दिया। गर्भवती कयाधु को नारद ने विष्णु भक्ति और भागवत तत्व से अवगत कराया। यह ज्ञान गर्भ में पल रहे पुत्र प्रहलाद ने भी प्राप्त किया। वहीं पर हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद का जन्म हुआ। देवर्षि नारद मुनि की संगत में रहने के कारण प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त बन गया। उधर, कई वर्षों तक तपस्या के बाद हिरण्यकश्यप को ब्रह्मा ने दर्शन दिए। ब्रह्माजी ने हिरण्यकश्यपु से वरदान मांगने को कहा तो उसने अमर होने का वर मांगा। हालांकि ऐसा वर देना संभव नहीं था तो ब्रह्माजी ने उससे कुछ और वर मांगने को कहा। इसके बाद हिरण्यकश्यपु ने ब्रह्माजी से वर मांगा- आपके बनाए किसी प्राणी, मनुष्य, देव-दैत्य, पशु, नागादि से मेरी मौत न हो। मैं सभी प्राणियों पर राज करूं। कोई मुझे न दिन में मार सके और न रात में। न मैं घर के अंदर मर सकूं और न बाहर। न कोई अस्त्र से मार सके और न शस्त्र से। न कोई मुझे भूमि पर मार सके और न आकाश, पाताल और स्वर्ग में। कुल मिलाकर, अपनी समझ में उसने अमरता का वरदान मांगा। ब्रह्माजी ने हिरण्यकश्यपु को यह वरदान दे दिया किंतु, इसके बाद वह निरंकुश हो गया। वह ऋषि-मुनियों की हत्या करवाने लगा, देवताओं को दास बनाने लगा। पूजा-पाठ, यज्ञ आदि में विघ्न बाधाएं डालने लगा। वह यही नहीं रुका, उसने देवताओं की पूजा करने के बजाय अपनी पूजा करने का आदेश दे दिया। इसी बीच उसके घर में प्रह्लाद का जन्म हुआ। उसे कुछ समय बाद गुरुकुल भेज दिया गया। यहां प्रह्लाद विष्णु पूजा करने लगा, उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु भक्ति में लीन रहता। जब यह बात हिरण्यकश्यपु को पता चली तो वह क्रोधित हो उठा। उसने कई प्रयास किए कि प्रह्लाद विष्णु पूजा करना छोड़ दे, लेकिन इसमें असफलता मिली। इसके बाद प्रह्लाद को मारने की कोशिश की गई। सैनिकों द्वारा उसे विष दिया गया, उस पर तलवार से प्रहार किया गया, विषधरों के सामने छोड़ा गया, हाथियों के पैरों तले कुचलवाना चाहा, पर्वत से नीचे फिंकवाया, इसके अलावा भी कई प्रयास किए गए लेकिन श्रीहरि विष्णु कृपा से प्रहलाद का बाल भी बांका नहीं हुआ। फाल्गुन शुक्ल सप्तमी को प्रहलाद को बंदी बनाकर पूरे आठ दिन तक त्रास दिया गया। हर तरह से मारने का प्रयास किया। लेकिन प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ |
हिरण्यकश्यप की एक बहन थी होलिका। होलिका को भी भगवान ब्रह्मा से एक वरदान मिला था। यह कि उसे अग्नि नहीं जला सकती। हिरण्यकश्यप ने होलिका को कहा कि वह प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए, ताकि प्रह्लाद भाग न सके और वह उसी अग्नि में जलकर ख़ाक हो जाए। फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होलिका अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर बैठ गई, लेकिन होलिका तो जल गई पर प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ। दरअसल होलिका को अहंकार हो गया था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी, जबकि उसे यह वरदान था कि उसे आग से तब तक नुकसान नहीं पहुंचेगा, जब तक वह किसी सद्गति वाले मनुष्य का अहित करने का न सोचे। कहा जाता है कि होलिका के एक वस्त्र में न जलने की शक्तियां समाहित थीं, किंतु भगवान विष्णु की कृपा से चली तेज आंधी से वह वस्त्र होलिका से हटकर, प्रह्लाद के शरीर से लिपट गया था। होलिका के जलने और प्रह्लाद के बच जाने पर नगरवासियों ने उत्सव मनाया, जिसे छोटी होली के रूप में भी जानते हैं। इसके बाद जब यह बात फैली तो विष्णु भक्तों ने अगले दिन और भी भव्य तरीके से उत्सव मनाया। होलिका से जुड़ा होने के कारण आगे इस उत्सव का नाम ही होली पड़ गया। उधर, हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के लिए उसे एक खंभे में बांध दिया। उसने गुस्से में प्रह्लाद से पूछा कि किसकी वजह से तू मेरी आज्ञा नहीं मानता है। इस पर प्रह्लाद ने अपने पिता से आसुरी स्वभाव छोड़ने और समता भाव को अपनाने की प्रार्थना की। इससे हिरण्यकश्यपु आगबबूला हो गया। उसने कहा, तू मेरे सिवा किसी और को जगत का स्वामी मानता है, कहां है वो? क्या इस खंभे में है? और यह कहते हुए उसने खंभे में घूसा मारा। इतने में गर्जन के साथ खंभा फट गया और उससे एक खतरनाक रूप प्रकट हुआ। सिंह का सिर, मनुष्य का धड़, बड़े-बड़े नाखून, खतरनाक चेहरा, पीली आंखें और तलवार जैसी जीभ। यही भगवान का नरसिंह अवतार था। उन्होंने हिरण्यकश्यपु को संध्याकाल में सभा की दहलीज पर अपनी जांघों पर रखा और अपने नाखूनों से उसका कलेजा चीर दिया। नरसिंह भगवान ने हिरण्यकश्यपु को न दिन में मारा न ही रात में, न बाहर मारा न अंदर, न जमीन पर मारा न आसमान पर और न अस्त्र से मारा और न शस्त्र से। इस तरह ब्रह्माजी के वरदान का मान भी रह गया। इसके बाद प्रह्लाद ने नरसिंह भगवान की प्रार्थना की, तब जाकर उनका क्रोध शांत हुआ। भगवान ने भक्त प्रह्लाद को उसका उत्तराधिकारी बना दिया।
शिवजी और कामदेव की कथा
सबसे प्रचलित कथा सतयुग में होलिका दहन की ही है, लेकिन बाद के युगों में भी यह उत्सव अलग-अलग समय पर मनाया जाता रहा और इससे अन्य कथाएं भी जुड़ती गईं। होली की एक कहानी कामदेव की भी है। पार्वती शिव से विवाह करने के लिए उनकी तपस्या में लीन थीं लेकिन खुद ध्यानमग्न शिव ने काफी समय तक ध्यान नहीं दिया। इंद्र ने कामदेव को भगवान शिव की तपस्या भंग करने का आदेश दिया। कामदेव ने उसी समय वसंत को याद किया और अपनी माया से वसंत का प्रभाव फैलाया, इससे सारे जगत के प्राणी काममोहित हो गए। कामदेव का शिव को मोहित करने का यह प्रयास होली तक चला। होली के दिन भगवान शिव की तपस्या भंग हुई। उन्होंने रोष में आकर कामदेव को भस्म कर दिया तथा यह संदेश दिया कि होली पर काम (मोह, इच्छा, लालच, धन, मद) इनको अपने पर हावी न होने दें। तब से ही होली पर वसंत उत्सव एवं होली जलाने की परंपरा प्रारंभ हुई। कामदेव के भस्म होने पर उनकी पत्नी रति रोने लगीं और कामदेव को जीवित करने की गुहार लगाई। इसके अगले दिन क्रोध शांत होने पर शिव ने कामदेव को पुनर्जीवित कर किया। माना जाता है कि कामदेव के भस्म होने पर होलिका जलाई जाती है, तो उनके जीवित होने की खुशी में रंगों का त्योहार होली मनाई जाती है। इस घटना के बाद शिवजी ने माता पार्वती से विवाह की सम्मति दी। जिससे सभी देवी-देवताओं, शिवगणों, मनुष्यों में हर्षोल्लास फैल गया। उन्होंने एक-दूसरे पर रंग गुलाल उड़ाकर जोरदार उत्सव मनाया, जो आज होली के रूप में घर-घर मनाया जाता है।
महाभारत काल की कथा
महाभारत काल, यानि द्वापर में युधिष्ठिर को प्रभु श्रीकृष्ण ने एक कहानी सुनाई। एक बार श्रीराम के पूर्वज रघु के शासन मे एक असुर महिला थी। उसे कोई नहीं मार सकता था, क्योंकि उसे एक वरदान था। एक दिन, गुरु वशिष्ठ ने बताया कि उसे मारा जा सकता है, यदि बच्चे अपने हाथों में लकड़ी के छोटे टुकड़े लेकर शहर के बाहरी इलाके के पास चले जाएं और सूखी घास के साथ उनका ढेर लगाकर जला दें। फिर, उसके चारों ओर परिक्रमा करें, नृत्य करें, ताली बजाएं, गाना गाएं और नगाड़े बजाएं। फि़र ऐसा ही किया गया और वह असुर मारी गई। कहा जाता है कि इसके बाद से बुराई पर जीत के प्रतीक के रूप में होली मनाई जाती है।
होली सबसे अधिक प्रसिद्ध हुई द्वापर युग, यानी श्रीकृष्ण के युग में। पौराणिक कथा के अनुसार, कंस को पता चला कि श्रीकृष्ण गोकुल में हैं, लेकिन यह नहीं पता था कि कहां। इसके बाद उसने पूतना नामक राक्षसी को गोकुल में जन्म लेने वाले सभी बच्चों को मारने को कहा। पूतना वेश बदलकर स्तनपान के बहाने शिशुओं को विषपान करा देती थी। लेकिन, कृष्ण ने दुग्धपान करते हुए ही पुतना के प्राण खींच लिए। पूतना के वध पर खुशियां मनाई गईं, और यह एक कहानी भी होली से जुड़ गई।
हिंदू धर्म के सभी त्योहार में खुशियां हैं, लेकिन इसके पीछे गंभीर संदेश भी है। जैसे, दिवाली अधर्म पर धर्म के विजय का प्रतीक है, वैसे ही होली भी है। इस त्योहार का स्पष्ट संदेश है कि घमंड अच्छा नहीं होता। ईश्वर से बढ़कर कोई नहीं होता। जो भी विधि के विधान को नहीं मानता, उसे कोई बचा नहीं सकता, जैसे होलिका या हिरण्यकश्यप वरदान के बावजूद भी मारे गए।
ये भी एक कारण है होली मनाने का
राजा रघु के राज्य में ढुण्डा नाम की एक राक्षसी ने शिव से अमरत्व प्राप्त कर लोगों को खासकर बच्चों को सताना शुरु कर दिया। भयभीत प्रजा ने अपनी पीड़ा राजा रघु को बताई।
तब राजा रघु के पूछने पर महर्षि वशिष्ठ ने बताया कि शिव के वरदान के प्रभाव से उस राक्षसी की देवता, मनुष्य, अस्त्र-शस्त्र या ठंड, गर्मी या बारिश से मृत्यु संभव नहीं, किंतु शिव ने यह भी कहा है कि खेलते हुए बच्चों का शोर-गुल या हुडदंग उसकी मृृत्यु का कारण बन सकता है।
अत: ऋषि ने उपाय बताया कि फाल्गुन पूर्णिमा का दिन शीत ऋतु की विदाई का तथा ग्रीष्म ऋतु के आगमन का होता है। उस दिन सारे लोग एकत्र होकर आनंद और खुशी के साथ हंसे, नाचे, गाएं, तालियां बजाएं।
छोटे बच्चे निकलकर शोर मचाएं, लकडिय़ा, घास, उपलें आदि इकट्ठा कर मंत्र बोलकर उनमें आग जलाएं, अग्नि की परिक्रमा करें व उसमें होम करें। राजा द्वारा प्रजा के साथ इन सब क्रियाओं को करने पर अंतत: ढुण्डा नामक राक्षसी का अंत हुआ।
इस प्रकार बच्चों पर से राक्षसी बाधा तथा प्रजा के भय का निवारण हुआ। यह दिन ही होलिका तथा कालान्तर में होली के नाम से लोकप्रिय हुआ।
